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शब्दार्थ |
भावार्थ
48 अनुवादक - बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
काल की ठि० स्थिति गो० गौतम ज० जघन्य द० दश वर्ष स० सहस्र उ० उत्कृष्ट सा० अधिक सा० सागरोपम || १५ || असुर कुमार के० कितनाकाल में आ० थोडा श्वासले पा० बहुत श्वास से ऊ० ऊंचा श्वासले णी० नीचाश्वासले गो० गौतम ज० जघन्य स० सात थो० स्तोक उ० उत्कृष्ट सा० अधिक प० पक्ष
* प्रकाशक - राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
ठिई प० गोयमा जहणेणं दस वास सहस्साइं ठिई प० उक्कोसेणं साइरेगं सागरोवमं ॥ १५ ॥ असुरकुमाराणं भंते केवइयं कालं आणमंतिरा, पाणमंति वा ऊससंतिवा, नीससंतिवा ॥ पुच्छा ॥ गोयमा ! जहण्णेणं सत्तण्हं थोवाणं, उक्कोसेणं साइरेगस्स पक्खस्स आणमंतिवा पाणमंतिचा, ऊससंतिवा, नीससंतिवा ॥ १६ ॥ असुरचलित कर्म की निर्जरा करे अचलित कर्म की निर्जरा करे नहीं ॥ १४ ॥ अहो भगवन् ! असुर कुमार की कितने काल की स्थिति कही ? अहो गौतम ! असुरकुमार की स्थिति जघन्य दश हजार वर्ष की उत्कृष्ट एक सागरोपम से कुच्छ अधिक कही [ उत्तर दिशाके बलेन्द्र आश्रित जानना ] || १५ || अहो भगवन् ! | असुरकुमारके देव कितने काल में श्वासोश्वास लेते हैं ? अहो गौतम ! असुर कुमार के देव जघन्य सात ( स्तोक में उत्कृष्ट एक पक्ष से कुच्छ अधिक में श्वासोश्वास लेवे ॥ १६ ॥ अहो भगवन् ! असुरकुमार आहार के अर्थी हैं ? हां गौतम ! वे आहार के अर्थी हैं. अहो भगवन् ! कितने समय में उन को आ१ अमुरनिकाय में उत्पन्न होनेसे व कुमारकी तरह क्रीडा करनेसे असुरकुमार कहाये गये हैं:
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