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प्रयोजक बाल ब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
| ५२६ सर्वानुभूति सुनक्षत्र साधु की गति ५२७ गोशालक का पुण्यप्रभाव ५२८ सोमंगल अनगारने गोशालक जीव को जलाया
. २१२९ ...२१३३
...२१४४
५२९ गोशालक का भव भ्रमण ...२१५३ ५३० गोशालक दृढ प्रतिज्ञा केवली हो मोक्ष गये
.२१६६
षोडश शतक का प्रथमोद्देशा. ५३१ अग्नि काय वायु काय का सम्बन्ध २१७१ १५३१ भट्टी संडास आदि उपकरणों की क्रिया २१७२ ५३२ जीव अधिकारणी के अधिकरण २१७७ सोलवा शतक का दूसरा उद्देशा. १५३३ शारीरिक मानसिक दुःख ५३४ भगवंतने शक्रेन्द्र से पांच अवग्रह कहे इन्द्रने साधुओं को आज्ञा दी १५३५ शक्रेन्द्र समवादी है ५३८ ऊघडे
... २१८२
...२१८७
... २१८७
मुख से बोले सो सावध भाषा, २१८८
५३९ जीव को चैतन्य कृत कर्म हैं। सोलवे शतक का तीसरा उद्देशा, ५४० कर्म प्रकृति स्वयं कृत वेदता है
२१९१
५४१ साधु की औषधोपचार में क्रिया नहीं २१९४ - २२ सोलवा शतक का चौथा उद्देशा. ५४२ चौथ भक्तादि तपश्चर्या का फल ५८२ तपश्चर्या से कर्म क्षपने के दृष्टांत
२१८९
२१९६ २१९९
सोलवा शतक का पाचवा उद्देशा. ५८३ शक्रेन्द्र से ऊपर के देवों का तेज अधिक २२०२ ५८४ देवता को विशिष्ट ऋद्धि कैसे मिली २२१३ सोलवे शतक का छट्ठा उद्देशा.
५८५ पांच प्रकार से स्वप्न आवे वगैरा २२२० ५८६ पाप स्वप्न महास्वप्न तीर्थंकरादि के स्वप्न२२२१ ५८७ महावीर स्वामी के १० स्वप्न ५८८ मोक्ष प्राप्ति के १६ स्वप्न
२२२४
२२३२
५८९ सातवा उद्देशा दो प्रकार उपयोग २२४०
*मकाशक- राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी*