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भंते ! भंतेत्ति जाब विहरइ ॥ चौतीसइभस्स सयरस पढमोद्देस सम्मत्ती ॥३४॥३॥ कइविहाणं भंते ! अगंतरोववण्णगा एगिदिया पण्णत्ता ? गोयमा ! पंचिन्विहा अणंत रोववण्णगा एगिदिया प० तंजहा-पुढवीकाइया दुपदे भेदो जहा एगिदिए सएसु जाव वादर वणस्सइकाइया ॥ १ ॥ कहिणं भंते ! अणंतरोववष्णगा वायर पुढविकाइयाणं ठाणा प०? गोयमा ! सट्टाणेणं अट्ठसु पढवीसु तंजहा रायणप्पभा जहा सट्टाणपदे जाव दीवसमुद्देसु ॥ एत्थणं अणंतरोधवष्णगाणवा वादर पुढवी
काइयाणं टाणा पं० उवातणं सव्वलोए, समुग्धाएणं सव्वलोए, संट्ठाण करते हैं. अहो गौतम ! इसलिये ऐसा कहा गया है यावन् विमात्रा विशेषाधिक कर्म करते हैं. अहो । भगवन् : आपके वचन सत्य हैं. यो यावत् विचरने लगे. यह चौतीमया शतकका पहिला उद्देशा संपूर्ण हुवा ॥३४॥
अहो भगवन् ! अनंतरात्पम्नक एकेन्द्रिय कितने को हैं? अहो गौतम ! अनंतरात्पन्नक एकेन्द्रिय पांच कहे हैं. पृथ्वीकाया यावत् वनस्पतिकाया. इस के सूक्ष्म व बादर अपर्याप्त पयाप्त ए अहो भगवन् ! अनंतरोत्पन्नक बादर पृथ्वीकाया के स्थानक कहां कह हैं ? अहो गौतम ! स्वस्थान पाश्री आठ पृथ्वीमें जिनके नाम-रत्नप्रभा वगैरह जसे स्थान पदमें कहा वैसा कहना यावत् द्वीप समुद्र तक. यहां अनंत
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10 अनवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवस हायजी ज्वालाप्रसादनी .
भावार्थ
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