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________________ 18sabsehenneth EPILES काहयति ॥ अणंतरोपवण्णग मुहुम पुढवी काइयाणं भंते..!' कहकम्मपगडाआ... - टेति ? गोयमा । वउद्दस कम्मपगडीओ वेदेति, तंजहा-णाणावरणिजं तहेव पुरिस . वेदकजं ॥ एवं अणंतरोपवण्णग बादर वणस्सइकाइयंति ॥ सेवं भंते ! भंतेत्ति ॥ ततीसमरस मयस्स वितिओ उद्देसो सम्मची ॥ ३२ ॥ २ ॥ काविहाणं भंते!परंपरोक्वण्णगा एगिदियाप०?गोयमा!पंचविहा परंपरोववण्णगाए गिदिया पण्णचा, तंजहा-पुढवीकाइया चउक्कभेदो जहा ओहिय उद्देसए ॥ परंपरोववण्णग अपज्जत्त कापा तक जानना. अहो भगवन् ! अनंतरोत्पत्रक सूक्ष्म पृथ्वीकाया कितनी कर्म प्रकृतियों वेदते हैं ? अहो गौतय ! चउदह कर्म प्रकृतियों वेदते हैं. जिन के नाम ज्ञानावरणीय पावत् पुरुष वेद वध्य. देने ही अनंतर बादर वनस्पतिकाया पर्यन्त कहना. अहो भगवन् ! आपके वचन यह तेत्तीसवा शनक का दूसरा उद्देशा संपूर्ण हवा ॥३३ ॥२॥ । अहो भगवन् ! परंपरा उत्पन्न एकेन्द्रिय के कितने भेद कहे हैं ? अहो गौतम : परंपरा उत्पन्न केन्द्रिय के पांच भेद को. जिन के नाम पृथ्वीकाया यावत् वनस्पतिकाया. यों एकेक का औधिक जैसे चार २ भेद करना. अहो भगवन् ! परंपरा उत्पन्न अपर्याप्त सूक्ष्म पृथ्वीकाया को कितनी कर्म. पाशा-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालामसादजी * भावा
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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