________________
भावार्थ
८०३ अनुवादक - बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी
ठाणा एवं चैव एवं जान अणित्थंत्था || एवं पएसटुयाएवि || एवं दव्बटु पएस - या || २ || एसि भंते ! परिमंडलवतंसचउरंसआयतअणित्थं त्थाणं संठाणाणं, दव्बट्टयाए पदेसट्टयाए दव्यपदेसट्टयाए कयरे कयरेहिंतो जाव विसेसाहियावा ? गोयमा ! सव्वत्था परिमंडलसंद्वाणा दव्वट्टयाए, वहा संट्ठाणा दव्वटुयाए: संखेज्ज गुणा चउरंसा संद्वाणा दव्वट्टयाए संग्खज्जगुणा, तसा संद्वाणां दव्बट्टयाए संखेजगुणा, असंख्यात नहीं परंतु अनंत हैं ऐसे ही वृत्त व्यंम, चौरंस, आयत और अनित्यस्थ का जानना. जैसे है पारमंडलादि द्रव्यार्थ से अनंत हैं वैसे ही प्रदेशार्थ से भी अनंत हैं. और द्रव्य प्रदेश से भी अनंत हैं. ॥२॥ अहो भगवन् ! इन परिमंडल, वृत्त त्र्यंम, चौरंस आयान और अनित्यस्थ संस्थान में मे द्रव्यार्थ प्रदेशार्थ और द्रव्य प्रदेशार्थ में से कोन किस से अल्प बहुत यावत् विशेषाधिक हैं ? अहो गौतम ! सब से थांडे परिमंडल संस्थान द्रव्यार्थ से इस से वृत्त संस्थान संख्यात गुने, इस से
संस्थान अन्य संस्थान की अपेक्षा से विशेष पुगलों अवगाहे वह संस्थान उस अन्य संस्थान की अपेक्षा से कम कहा जाता है. जैसे परिमंडल संस्थान जघन्य वीस प्रदेशावगाहित है और वृत पांच चौरंस चार, इयंस तीन और आयात दो; यो कम प्रदेशावगाहित होने से थोडा क्षेत्र में रहते हैं जिस से ज्यादे मीलते हैं और परिमंडल ज्यादे प्रदेशावग्राही होने से नाम पाते हैं.
* प्रकाशक - राजा बहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
*
२७०८