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भयुधिग्गा भीया जम्मणमरणाणं देवाणुप्पिएहिं सहिं मुणिसुव्वयस्स अरहओ अंतिय मुंडे भवित्ता आगाराओ जाव पव्ययामो ॥१०॥ तएणं से कत्तिए सेट्ठी णेगमट्टसहस्सं एवं वय सी जइणं देवाणुप्पिया ! संसार भयुटिवग्गा भीया जम्म
२३०९ णमरण,णं नए सा िमुणि सुब्बय जाव पयायह तं गच्छहणं तुभ देवाणुप्पिया ! सएसु २ गेहेसु विलं असणं जाव उवक्खडावह मित्तगाइ जाव जेट्टपुत्तं कुटुंबे ठावेह, जेट्ठात्तं कुटुंबे ठावेत्ता तं मित्तणाइ जाव जेटुपुत्तं आपुच्छेह २ त्ता पुरिस
सहस्सवाहिणीओ सीयाओ दुरूहह पु० २ मित्त जाव परिजणेणं जेट्टपुत्तेहिय भावार्थ किस का अवलम्बन, आधार व प्रतिबंध है. इस से हम भी संसार भय से उद्विग्न व जन्म जरामरण से
त्रसित हुवे हैं. और हम भी आप की साथ श्री मुनिसुव्रत अरिहंत की पास मुंड होकर अगारपना मे । अनगारपना अंगीकार करेंगे ॥ १० ॥ फीर कार्तिक श्रेष्ट उन एक हजार आठ गुमास्त को ऐसा बोले कि ।
जब तुम संसार भय से उद्विग बने हुवे हा यावत् मेरी साथ मुनि सुत्रत अरिहंत की पास दीक्षा XI 10 अंगीकार करना चाहते हो तो तुम अपने २ गृह : जाओ, विपुल अश-391
नादि तैयार करो, ज्येष्ठ पुत्र को कुटुम्ब में स्थापो और मित्र झाति यावत् ज्येष्ठ ?
* पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भावती ) मूत्र
4.2*- अठारहवा शतक का दूसरा उद्देशा
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