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सूत्र
भावार्थ
49 अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
अहियासणाया मारणांतियअहियासणया, एएणं किं पजवसाणफला पण्णत्ता ? समणाउसो ! गोयमा ! संवेग णिव्वेगेजाव माणांतिय अहियासणया एएणं सिद्धपजवसाण फला पण्णत्ता समणाउसो || सेवं भंते भंतत्ति | जाव विहरइ || सत्तरसमस्स तइओ उद्देसो सम्मत्तो ॥ १७ ॥ ३ ॥
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ते कालेणं तेणं समएणं जाव एवं वयासी अस्थि
भंते! जीवाणं पाणाइत्राएणं
आगम मार्ग में प्रवर्तने से ३२-४५ क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष, कलह, अभ्याख्यान, पैशून्य, परपरिवाद, रति, अरति मायामृषा व मिथ्यादर्शन शल्य इन की निवृत्ति से ४६ ज्ञान युक्त, ४७ दर्शन युक्त ४८ चारित्र युक्त ४९ क्षुधा वेदनीय समभाव से सहन करने से और ५० मरणांतिक समभाव से सहन करने से; उक्त सब बोलों से क्या जीव को मोक्ष पर्यवसान रूप फल होता है ? अहो आयुष्यवंत श्रमणो ! अहो गौतम ! संवेग यावत् मरणांतिक समभाव से मोक्ष रूप पर्यवसान फल होता {है. अहो भगवन् ! आपके वचन सत्य हैं. यों कहकर यावत् विचरने लगे. यह सतरहवा शतक का तीसरा उद्देशा संपूर्ण हुवा ॥ १७ ॥ ३ ॥
तीसरे उदेशे में एजनादि क्रिया कही. चौथे उद्देशे में भी उसकाही कथन करते हैं. उस काल उस
{ समय में यावत् गौतम स्वामी ऐसा पूछने लगे कि अहो भगवन् ! क्या जीवों को प्राणातिपात से क्रिया
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* प्रकाशक राजा बहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
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