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साधुसाध्वी जीवाए तिविहं तिविहेण [ वोसिरामि ] वोसिरइ।"
पर्यत । और अच्छे शकुन लेकर वजनादिकों की सम्मतिसे बीमार साधु या साध्वी वांदणे देकर नवकार
आराधना
विधि गिनकर अणसण उच्चरें. अणसण दो तरहके होते हैं, एकतो सागारिक और दूसरा निरागारिक, सागारिक का * पञ्चक्खाण इस मुजवहै| "भवचरिमं सागारं पञ्चक्खामि तिविहंपि आहारं, असणं, खाइमं, साइमं, अन्नत्थणा भोगेणं, सहसागारेणं, महत्तरागारेणं, सव्वसमाहि वत्तिआगारेणं, अरिहंत सक्खिअं, सिद्ध सक्खिअं, साहु सक्खिअं, देव
सक्खिअं, गुरु सक्खिअं, अप्पसक्खिअं, वोसिरामि"। यह तीन वार उच्चरें । FI निरागारिक अणसण का पञ्चक्खाण इस मुजब है
"भवचरिमं निरागारं पच्चक्खामि चउव्विहंपि आहारं, सव्वं असणं, सव्वं पाणं, सव्वं खाइम, सव्वं , साइम, अन्नत्थणा भोगेणं, सहसा गारेणं, अइयं निंदामि, पडुप्पन्नं संवरेमि, अणागयं पञ्चक्खामि , अरिहंत ॥६॥ सखिअं, सिद्ध सक्खिों , साहु सक्खिअं, देव सक्खिअं, गुरु सक्खिअं, अप्प सक्खिों वोसिरामि"।
SAXA XANAXARAMASASARAN
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