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सिरिसंतिनाहचरिए
तस्सऽत्थि रूविणीए भज्जाए सयलगुणकलाकलिया । धूया अणन्नसरिसा रूवेण रइ व्य पच्चक्खा ||१५||५९१६॥ नाणं सीलवई 'इत्थीरयणं' ति भणियसुपसिद्धा । सा तस्स कए वरिया सायरदत्तेण पुत्तस्स ॥ १६ ॥ ५९१७॥ गणिए पहाणलग्गे समत्थसामग्गिसंजुए पत्ते । बहुतूरनिनाएहिं विवाहवरमंगलं विहियं ॥ १७ ॥ ५९१८॥ सो तीए समं चिटुइ ललमाणो विविहविसयभोगेहिं । कीलइ कीलाहिं तहा परियरिओ मित्तवग्गेहिं ॥ १८ ॥ ५९१९॥ अह अन्नया कयाई सेट्ठी विद्वत्तणम्मि संपत्ते । सयलमहायणसहिओ पुरओ नरनाहमाईणं ॥ १९ ॥ ५९२० ।। डावेइ णिययपुत्तं निययपए अप्पणा वि धम्मम्मि । देइ सविसेसचित्तं, दाणाईयं पवत्तेइ ॥२०॥५९२१॥ पूएइ देवयाओ, गुरूण भत्तिं पयासए अहियं । अन्नं पि धम्मकिघं करेइ सव्वं पि सविसेसं ॥२१॥५९२२॥ एवं वच्चतेहिं कहिं वि दिवसेहिं तस्स सेट्ठिस्स । विहिपुव्वयं च जायं मरणं निययम्मि समयम्मि ||२२|| ५९२३॥ सो विहु समुद्ददत्तो पालइ तं कुलकमागयं ठाणं । अह अन्नया य जाया कल्लोला तस्स चित्तम्मि ॥२३॥५९२४॥ "गंतूण दूरदेसंतरम्मि विढवित्तु अइबहुं दव्वं । कारेमि कित्तणाई, देमि जहिच्छाए तह दाणं” ॥ २४ ॥ ५९२५ ॥ इय चिंतिऊण चित्ते, सव्वं साहेइ पिययमाए तयं । सा वि हु जंपइ 'पिययम ! तुह विरहो दूसहो मज्झ' ॥२५॥५९२६॥ भणियं च सेद्विणा विहु 'सच्चमिणं पिययमे ! तहवि एयं । कायव्वं चेव मया, जम्हा अईउडुयं चित्तं ' ॥२६॥५९२७ ॥
१. "इओ हुयं पा० ।।
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सीलवईअ सीलस्स
रक्खणं
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