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कल्प०
वारसा०
॥ ५४ ॥
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अभिनंदणस्स णं अरहओ जाव पहीणस्स दस सागरोवमकोडिसयसहस्सा विइकंता, सेसं जहा सीअलस्स तिवासअहनवमासा हियबायालीसवाससहस्सेहिं इच्चाइयं ॥ २०२ ॥ ४ ॥
संभवस्स णं अरहओ जाव पहीणस्स वीसं सागरोवमकोडिसयसहस्सा विइकंता, सेसं जहा सीअलस्स, तिवास अद्धनवमासा हियबायालीसवाससहस्सेहिं इच्चा
इयं ॥ २०३ ॥ ३ ॥
अजियस्स णं अरहओ जाव पहीणस्स पन्नासं सागरोवमकोडिसयसहस्सा विइक्कंता, सेसं जहा सीअलस्स, तं च इमं - तिवास अद्धनवमासाहियबायालीसवाससहस्सेहिं इच्चाइयं ॥ २०४ ॥२॥
॥ इति अन्तराणि ॥
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श्रीजिनानामन्त
राणि
॥ ५४ ॥
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