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________________ अध्यात्म० ॥ १११ ॥ Jain Education ओरालिअत्तणेणं तह परमोरालिअंपि केवलिणो । कवलाहारावेक्खं ठिइं च बुद्धिं च पाउणइ ॥ ११६ ॥ णय महणाणपसत्ती कवलाहारेण होइ केवलिणो । पुप्फाईअं विसयं अण्णह घाणाइ गिहिजा ॥ ११७ ॥ इरिआवहिआकिरिया कवलाहारेण जइ णु केवलिणो । गमणाइणावि ण हवे सा किं तुह पाणिपिहिअत्ति ११८ णय परुवयारहाणी तेण सया जोग्गसमयणियएण । ण य वाहिसमुप्पत्ती हिअमिअआहारगहणाउ ॥ ११९ ॥ ण पुरीसाइदुगुंछियमेसिं णिड्डूमोहबीआणं । अइसयओ ण परेसिं विवित्तदेसे विहाणा य ॥ १२० ॥ जो पुण भुत्तिअभावो केवलिणो अइसउत्ति जंपेइ । सो वायामित्तेणं साहेउ सुहं खपुकंपि ॥ १२१ ॥ एवं कवलाहारो जुत्तीहिं समत्थिओ जिणवराणं । पुत्रायरिएहिं जहा तहेव लेसेण उवठ्ठो ॥ १२२ ॥ तेणं केवलनाणी कयकिच्चो चेव कवलभोईवि । नाणाईण गुणाणं पडिघायाभावओ सिद्धो ॥ १२३ ॥ नाणस्स विसुद्धीए अप्पा एगन्तओ ण संसुद्धो । जम्हा नाणं अप्पा अप्पा नाणं व अण्णं वा ॥ १२४ ॥ एवं परमप्पत्तं नाणा इदुवारगं मुणेअवं । सवह परमप्पत्तं सिद्धाणं चैव संसिद्धं ॥ १२५ ॥ तस्स य सहावसिद्धा किरिया गुणकरणजोगमहिगिच्च । कम्मुवणीआवि हवे जुंजणकरणं तु अहिगिच ॥ १२६ ॥ अह सो सेलेसीए झाणाणलदड्डसयलकम्ममलो । कणगं व सह चिय लद्धसहावो हवइ सिद्धो ॥ १२७ ॥ | तस्स वरनाणदंसणवर सुहसम्मत्तचरणनिश्चटिई । अवगाहणा अनंता मुत्ताणं खइयविरिअं च ॥ १२८ ॥ For Private & Personal Use Only (25) परीक्षा मू० ॥ १११ ॥ w.jainelibrary.org
SR No.600058
Book TitleAdhyatmamatpariksha Swopagnyavruttyupeta
Original Sutra AuthorYashovijay Upadhyay
Author
PublisherDevchand Lalbhai Pustakoddhar Fund
Publication Year1911
Total Pages240
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size12 MB
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