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________________ बीमन्महाभारतम् ।। श्लोकामुकमणी ६९२ विश्वसम्भ्यस्तु भूतेव्यो (आश्व)५१.१३ विश्वामित्रस्तु शिष्य(उद्योग) १०६.१९ विश्वामित्रोऽहमायुष्म(शांति)१४१.४७ विश्वेदेवांस्तथा साध्यान्(वन) ३७.३५ विषमस्थं हि राजानं (शांति) १३८.५ विश्वसृग्यत्र गोविन्दः (द्रोण) ३३.१२ विश्वामित्रः स्थूलगिराः (अनु) २६.५ विश्वावमुप्रतिभिः (वन) ४३.१८ विश्वेदेवाश्च ये नित्यं (अनु) ६१.२४ विषम जनयन्त्येत (भीष्म) ३.३१ विश्वस्तवदविश्वस्त (शांति) ८०.३९ विश्वामित्रस्य तत्रैव (वन) ८३.१३६ विश्वावसुर्नारदश्च (उद्योग) ११.१५ विश्वेदेवाश्व में मित्र (अनु) २३.६६ विहम पर्वतसस्तै रश्मिभि(आ) ६६.१८ विश्वस्त वा प्रमत्तं (शांति)१३८.१७५ विश्वामित्रस्य विपुला (अनु) ३.१० विश्वावसुविश्वमूर्ति (भीष्म) ६५.४७ विश्वेदेवाः सपितरः (शात) १७१.१५ विषमं पश्यते राजा (आ) १४५.७ विश्वस्तस्यति यो (उद्योग) ३७.१२ विश्वामित्रस्य विप्रः (शल्य) ४२.३ विश्वावसुविश्वसेनो (शांति) २८४.७ विश्वेदेवास्तथा साध्या (आ)२२७.३८ विहम शकुनेश्चैव तव (शल्य) ३३.८ विश्वस्तास्तेषु (शांति) १३८.१६८ विश्वामित्रस्य वै जन्म (अनु) ४.६२ विश्वावसुश्च गन्धर्व (शांति) २८३.११ विश्वेदेवश्च साध्यैश्च(शाति)१६५.१६ विषमालोऽय पास्यामि (विरा)२१.४८ विश्वस्थ मातरः सर्वाः (भीष्म) ६.३७ विश्वामित्रं च कवच (मौ) १.१५ विश्वावसुश्च ये चान्ये (आश्व)९२.२६ विश्वेशं कारगगुरु (अनु) १४.२२५ विषमाबस्थिते दैवे पौरुषे(वन)७६.१४ विश्वाची सहजन्या च(सभा) १०.११ विश्वामित्रं च दायाद (शांति) ४६.३० विश्वावसुस्ततो राजेन(शांति)३१८.२७ विश्वेश्वरमजं देवं (अनु) १४६.१४२ विषमा च दशां प्राप्ती (वन) २०६६ विश्वाच्या सहितो रमे(आ) ८५.६ विश्वामित्र चाजनयद् (अनु) ४.४७ विश्वावसोस्तु तनयाद् (वन) ६१.१४ विश्वेश्वर विश्वनर (द्रोण) २०२.१४ विषमुन्धनं चैव शस्त्रम (वन) ७.६ विश्वात्मने विश्वसृजे (द्रोण) ८०.६१ विश्वामित्र तपस्यन्त (उद्योग) १०६.८ विश्वावास निर्गणं (अनु) १५८.३६ विश्वेषां देवताना त(स्वर्ग। ५.१८ विश्वामित्रः क्षत्रभावन(आ) १७५.४५ विश्वामित्रात्मजाः सर्व (अनु) ४.६० विश्वाविश्वेति यदिद(शांति)३१८.३७ विषक्तः स शरैश्चापि(भीष्म)१००.४१ विषमुद्वन्धन दाहो (शांति) २६७.२५ विश्वामित्रममिसन (आ) १.२२७ विश्वामित्राय (उद्योग) विषमेतत् समालोऽय (वन) १५७.२७ ११९.१० विश्वासयित्वा तु परं(शांति) १४०.४४ विषण्णचताः पप्रच्छ वन) २८२.५३ विश्वामित्रवसिष्ठौ (शल्य) ४२.६ विश्वामित्र ण च पुरा (अनु) ३०.२ विश्वासयेत्परांश्चैव (शांति) ८५.३३ विषाणभूतं सर्वस्या (आ) १४.४६ साल विषयप्रतिसंहारो (शांति) १६६.११ विश्वामित्र श्चकारतत्(वन) २२६.१५ विश्वामित्रेण धर्मात्मन् (अनु) ३.२ विश्वास पात्र (शांति) १०२.४. विषण्णवदनश्चापि (दोण) ११०.११ विषयस्थ शरीरेषु (अनु) १६१.२० विश्वामित्रस्ततो (शांति) १४१.४६ विश्वामित्रो जमदग्नि(द्रोण) १६०.३३ विश्वासं समयघ्नाना (शल्य) ६४.३० विष विषयाणां च दौरात्म्य (शांति) ३०१.४१ विश्वामित्रस्ततो (शांति) १४१.६१ विश्वामित्रोऽथ तं (उद्योग) ११३.१९ विश्वासाद्धि परं (शांति) १३६.२ विषण्णवदनाश्चासन्(भीष्म) १२०.१७ विषयानश्नुते यस्तु न(शांति)२६८.२६ विश्वामित्रस्तदोवाच (अनु) १८.१६ विश्वामित्रोथ (शांति) १४१.२६ विदामादायमत्पनं शांति विश्वामित्रोथ (शांति) १४१.२६ विश्वासादायमूत्पनं शांति) १३८.१४५ विषण्णेन च तनव (भीष्म) १०२.३६ विषयानेवमस्माभिः (आश्व) २२.२५ . विश्वामित्रस्तु तं (उद्योग) ११६.१५ विश्वामित्रोऽथ (उद्योग) १०६.१० विश्वासेन तु निक्षिप्त (अनु)१११.१२४ विषमव्यवहाराश्च (अनु) २३.६८ । विषयान्ते कुलिन्दा (वन) १४०.२६ विश्वामित्रस्तु प्रथम (वन) २२६१२ विश्वामित्रोऽपि (शांति) १४१.६९ विश्वे चाग्निमुखा देवाः (अनु) ६१.२६ विषमस्थेन मूढेन (वन) ७०.१० विषयान्प्रतिसंगृह्य (शांति) १७.१० विश्वामित्रस्तु मातङ्ग(शांति) १४१.५० विश्वामित्रोऽसितश्चैव (आश्व) ११.३५ विश्वेदेवा नभश्चैव (अनु) १६५.३४ विषमस्थेन मूढेन परिभ्रष्ट(वन)७४.२७ विषया विनिवर्तन्ते (भीष्म) २६.५६ Jain Education Internation For Private Personel Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600055
Book TitleMahabharatam
Original Sutra AuthorNagsharan Sinh
Author
PublisherNag Prakashan Delhi
Publication Year1992
Total Pages840
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size30 MB
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