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________________ बीमन्महाभारतम् :: सोलानुक्रमणी प्रजायां रक्ष्यमाणायां (विरा) २१.४१ प्रजा सजेति चादिष्टः (बनु) ७७.११ प्रज्ञाचक्षुरचक्षुष्ट्वा (आ) १४१.२५ प्रप्रावान् थोत्रियो (शांति) २३६.२ प्रणयादभिमानाच्च (द्रोण) ३३.६ प्रजायं वरयामास नील (अनु) १६.४७ प्रजाः सृष्टा मनसा (शांति) २०१.१५ प्रज्ञाचक्षुर्यः प्रणेता (उद्योग) ३०१६ प्रज्ञाविज्ञानयुक्तेन (शांति) १५३.६३ प्रणयाद्बहुमानाच्च (कर्ण) ३२.५३ प्रजानां पालने युक्ता (शांति)२१.१९ प्रजाः सृष्ट्वा महातेजा(शांति)२५६.१३ प्रज्ञाचक्षुश्च दुर्धर्षः (सौप्तिक) ६.३४ प्रज्ञावृक्षं मोक्षफलं (आश्व) २७.१५ प्रणयेद्वापि तां भूमि (शांति) १२०.१५ प्रजावतो भरेषाश्च (बनु) ६१.१० प्रजाः सृष्ट्वा तदा ब्रह्मा(द्रोण)५२.३८ प्रज्ञा च ते भार्गवस्येव (वन) ४.२ प्रज्ञावृद्ध धर्मवृद्धं (उद्योव) ४०.२३ प्रणयेयुर्यथान्यायं (आश्रम) ५.२६ प्रजावान् श्रोत्रियो (शांति) २३४.७ प्रजास्तत्र विवर्धन्ते (भीष्म) ११.३१ प्रज्ञातलक्षणे मित्रे (शांति) १३८.८ प्रशाशरेणाभिहतस्य (उद्योग) ३७.५८ प्रणवं चाप्यधीयीत (अनु) ३६.१४ प्रजा विवर्धते चास्य (अनु) १२५.२८ प्रजास्त्वयता नियमेन (वन) २६७.३४ प्रज्ञाता या प्रशान्ता (अनु) १९.७४ प्रज्ञाश्रुताभ्यां वृत्तेन (अनु) २२.३८ प्रणश्येद्वो यशः सद्यो (आ) २२१.१२ प्रजा विवर्धते चास्य (अनु) १२५.४४ प्रजाहितार्थामारम्मो (आ) ३०.१७ । प्रज्ञा धर्म न रमते (शांति) २७३.१५ प्रज्ञाश्रु ताभ्यां वृत्तेन (अनु)२७.१ प्रणिधानेन धैर्येण (उद्योग) १०३.२१ जानित प्रजास्यति महाराज (वन) १६०.७० प्रज्ञानं शौचमेवेह (अनु) १०६.११ प्रज्ञा संयोजयत्ययः (शांति) २३७.६ प्रणिधींश्च ततः (शांति) ६६.८ प्रजावि तमशेष शातिर०.५२ प्रमोच्छेदमिमं मह्म (आ) १८२.१२ प्रज्ञानाभिः सर्वतंत्र (शांति) २३६.११ प्रशासम्भावितो नून (मनु) १२४.१६ प्रविधायेन्द्रियग्राम (आ) ११६.२६ प्रजाविसर्ग विविधं कथं (शांति)१८३.१ प्रजोच्छेदो मम कृतो (अनु) ६४.७५ प्रज्ञानाशप्मको मोह (शांति) १२३.१६ प्रणत: संभ्रमादेव प्राञ्जलि(आ)११६ प्रणिपत्य च कौन्तेयः (वन) १४७.२३ प्रजाविसर्ग विविधं (शांति) १८३.२ प्रज्वलन्ती महोल्केन (द्रोण) १४७.३५ प्रज्ञा प्रगल्भं कुरुते (शांति) ६८.५८ प्रणतश्च यथा मूर्ना (विरा) ६.२५ प्रणिपत्य ततः पार्थः (विरा) ४५.२८ प्रजा वो दद्मि कष्टं तु(वन)२३०.२० प्रज्वाल्य कृष्णवमान (द्रोण) १७.२७ प्रज्ञा प्रतिष्ठा भूतानां (शांति)१९०.२ प्रणमन्ति च ये त्वां (विरा) ६.१६ प्रणिपत्य ततस्ते तु (शल्य) ४४.४४ प्रजाश्चतुर्विधास्तेन (वन) १२६.४४ प्रजया निश्चिता धीरा (शांति)२३६.२ प्रज्ञाप्रासादमारुह्य (वन) २०७.६८ प्रणमे त्वाभिगम्याई (वन) १४.४३ प्रणिपत्य महात्मानं (आ) २२३.४३ प्रजाश्च यौवनप्राप्ता (आ) ८४.२६ प्रजया प्रापितार्थो हि (शांति) १८०.३ प्रज्ञाप्रासादमारुह्य (शांति) १७२० प्रणम्य तमहं मून (उद्योग) १७८.१८ प्रणिपत्य हि राजानं (शल्य) ४.४६ प्रजासंक्षेपसमये (वन) १५५.२७ प्रशयाऽभ्यधिकान् शूरान्(भीम) २१.७ प्रज्ञाप्रासादमारुह्य (शांति) १५१.११ प्रणम्य मनसा सर्व ततो(वन) १६७४६ प्रणिपत्य हृषीकेशभि (शांति) ५६.१ प्रजासर्गनिमित्तं हि कृतो द्रोण) ५३.१ प्रज्ञया मानसं दुःख (वन) २१६.१७ प्रज्ञामेवागमयति यः (उद्योग) ३५.६६ प्रणम्य विकपः पादा (बा) १५५.३७ प्रणिपातं च गच्छेत (शांति) १०३.२६ प्रजासर्गनिमित्तं मे (शांति) २५७.१ प्रज्ञया मानसं दु:खं (शांति) २०५.३ प्रज्ञाय सदृशश्चसि (उद्योग) ६.४ प्रणस्य शिरसा देवं (आ) १८८.१८ प्रणिपातेन दानेन (शांति) १०३.३० प्रजासर्गण दारैश्च (शांति) २३४.५ प्रज्ञया मानसं दुःखं (शांति ) ३३०.१३ प्रज्ञालाभात्तु दैतेय (शांति) २२२.१२ प्रणम्य शिरसा देवं (आश्व)८.३२ प्रणिपाते न दोषोऽस्ति (उद्योग)५५.१४ प्रजा: सर्व महाराज (वन) १०५.१९ प्रज्ञया मानसं दुःख (स्त्री) २.३१ प्रज्ञालाभे हि पुरुषः (उद्योग) ७२.३५ प्रणयं प्रतिसंहृत्य (वन) २३३.२० प्रणीतमृषिभित्विा (अनु) ४७.४३ प्रजासु तासु सर्वासु (वन) २१५.३ प्रशया वयसा व (आ) १७३.६ प्रज्ञावन्तौ नरश्रेष्ठा (आ) २०५.६ प्रणय प्रतिसंहत्य (शांति)३३०.२६ प्रणीतं कर्मणा मार्ग (शांति) २०४१५ For PhalasPersone use only
SR No.600055
Book TitleMahabharatam
Original Sutra AuthorNagsharan Sinh
Author
PublisherNag Prakashan Delhi
Publication Year1992
Total Pages840
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size30 MB
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