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श्रीमन्महाभारतम् :: लोकानुश्मणी
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त्रिदशानां वचः श्रुत्वा(वन) १०४.१६ त्रिपर्वणा त्रिशल्येन (द्रोण) २०२.८२ त्रिमिश्चिच्छेद सहसा (कर्ण) २६.२४ त्रिलोकविश्रु तं वीरं (अनु) १५०.५० विविधाः पुरुषा राउन्नु (उद्योग)३३.६३ त्रिदशान् वा समुयु(भीष्म) १०७.३६ त्रिपादं चायुत शतजंघान्(शल्य)४६.७५ त्रिभिस्तीक्ष्णमहावेग(भीष्म) १२०.४५ त्रिलोचनो विषष्णाङ्गो अनु) १७.१२८ त्रिविधा भवति श्रद्धा (भीष्म) ४१.२ त्रिदशानां विनाशाय (वन) २०२.२० त्रिः पीत्वासपो द्विः (अनु) १०४.११० त्रिमिस्त्रिभिर्भीमबलो(कर्ण) ८६.६२ त्रिवर्ग इति विख्यातो (शांति)५६.३० त्रिविषाणाश्चत नया(भीष्म) ३.३ त्रिदशाऽपि समुचुक्ता(भीष्म)११७.२६ त्रिपुरघ्नं त्रिनयनं (आश्व) ८.२८ त्रिभिस्त्रिभिमहेष्वासो (द्रोण) ११४.८० त्रिवर्गगुणनियंत्तिर्यस्य(शांति) १६१.१७ त्रिविष्टपगता राजन्सुरभी (बन) ६.७ त्रिदशानपि वा युक्तान्स(द्रोण)१३३.२ त्रिपुरघ्नरयो यद्वद्वो (द्रोण) १०५.१६ त्रिमिस्त्रिभियंमो (द्रोण) १२४.३३ त्रिवर्गमुख्यस्य समीर(वन) ११६.२१ त्रिविष्टपं प्रपद्यरव (उद्योग) १७.१६ त्रिदशाश्चापयबाधन्त (वन) १०७.६ त्रिपुरवधार्य दीक्षां (शांति) ३४२.२६ त्रिभिस्त्रिवेणु समरे (विरा) ५७.३७ त्रिवर्गयुक्त: प्राज्ञाना(उद्योग)१२४.३४ त्रिशङ्कुर्वन्धुभिमुंक्त (अनु) ३.६ त्रिदशेशद्विषो यावत् (वन) १७३.१७ त्रिपुरस्य वधार्याय (द्रोण) २०२.७९ त्रिभुवन विभुमीश्वरेश्वर(कर्ण) ३७.३५ त्रिवर्गश्चापि य प्रोक्तं (शांति) ६६.६६ त्रिशतं चोष्ट्रवामीनां (सभा) ४६.२०
त्रिभागश्चावशिष्टोऽयं (कर्ण) ५८.५ त्रियुगी पुण्डरीकाक्षी (अनु) १४८.५६ त्रिवर्ग सप्तधा व्यक्तं (शांति)३६०.१२६ त्रिशतं वै सहस्राणि (वन) ११४.१६ त्रिदशपु निवत्स्यामा(शाति) २२८.२५ त्रिमागमात्रशेषायां शल्यां(द्रोण)१८६.१ त्रियुगौ पुडिरीकाक्षी (वन) ८६.५ त्रिवनस्त्रिविधा पीडा(शांति) १४०.५७ त्रिशदेव सहस्राणि रथा (विरा)७०.१६ त्रिदर्शरपि चास्यद्भिः (द्रोण)१८०.२६ विभिऔर धर्मस्त (वन
वियोजनगतस्यापि (द्रोण) ११२.१३ त्रिवर्गाचरणे युक्तं (उद्योग) ३६.४० विशिखा द्विशिखाश्चैव शाल्य) ४५.६५ त्रिदिवं प्राप्य शक्रस्य (शांति) ११.२६ बिभिरासावितोस्माभिव(सभा) २०.४ विरात्रमुषितरतत्र (वन) ८५.२६ त्रिवर्ग चापवर्गे च (अनु) १५६.१० त्रिशिखा भ्र कुटीं कृत्वा (शल्प) ३२.४६ त्रिदिवे यस्य सदृशो (वन) २१९२३ विभिगुणमयविरेभि(भीष्म) ३१.१३ त्रिरात्रमुषित: शाकं (वन) ८४१७ त्रिवर्गे त्रिविधा पीटा (आ) १४०.६६ त्रिशिखां च कुटी चास्य(सभा) ४२.११ त्रिद्वारामर्थसिद्धि तु (वन) ३२.३८ विभिभवदिहि विना (सभा) २०.१३ त्रिरात्रमुषित : स्नात्वा (वन) ८५.३७ त्रिवर्गोयं धर्ममूलो नरेन्द्र (वन) ४.४ त्रिशिरारतस्य दिव्यश्च (अनु) १४७.५५ विधा चिच्छेत समरे(भीष्म) ४५.३२ विभिवर्षे: सदोत्यायी (आ) ६२.५२ विरात्रोपोषितस्तत्र (वन) ८४.१३६ त्रिवर्गों यस्य विदितः (शांति) १६४.५७ त्रिकिरेभिश्चतु दंश्च (वन) १७३ ५३ विधा विच्छेद समरे (शल्य) २८.४२ त्रिभिवर्षरिद पूर्ण (स्वर्ग) ५.४८ विरात्रोपोषितस्तेन (वन) ८३.१८१ त्रिवर्गो हि समासक्तो(शांति) ५६.४ त्रिशूलपाणि वरदं (द्रोण) २०२.४२ विधा दानानि दीयन्ते(आश्व) ३६.१६ त्रिभिर्व सारथि हत्वा (शस्य) १०.४३ त्रिरात्रोपोषित: स्नात्वा (वन)८३.१५२ विवर्षकृत यज्ञरतु (आ) १३६२० त्रिशूलपाणेः स्थानं च वन) ८२.१०३ त्रिधा भूता महाराज तब(शल्य ८.२६ त्रिभि शरैरसंभ्रान्तो (शल्य) १०.१४ त्रिरात्रोपोषितो भूत्वा (अनु) २५.१६ त्रिविधं नरकस्येद (उद्योग) ३३ ६६ त्रिशूलमश्रित्य सूतीक्ष्ण (कर्ण) ३६.१७ त्रिधाभूतेषु सैन्येषु (द्रोण) ६५.२७ त्रिभिः शरैमहान (भीष्म)११४.२६ त्रिरावः सप्तरावश्च (उद्योग) १०१.११ त्रिविधं नरकस्येदं (भीष्म) ४०.२१ विशूलाडानि पद्मानि बन) ८२.६७ विधाभूतैरवघ्यन्त (भीष्म) ८६.२१ त्रिभिः शारद्वतं (शल्य) २३.७ त्रिलोकपूजिते देवे (शांति) २८२.२५ त्रिविधं संस्थिता ह्यते (वन)२२०.१४ त्रिषु देशेषु ददतुः(सौप्तिक) ८११० त्रि: परिकान्तवानेतत् (शांति) ३४८.२१ त्रिभिश्च विशितैर्वाण (द्रोण) १६०.५६ त्रिलोकदिक्रमे ब्रह्म (उद्योग) १११.२२ त्रिविधानीह वृत्तानि (अनु) १२०.२३ त्रिषु लोकेषु कीर्तिश्च (वन)२३१.१०६
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