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अञ्जन प्र. कल्प
॥१८॥
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सोना वाणीनो मंत्र - बार - ७- नवकार साथै :
"ॐ ह्रीँश्रीँ जीवलीपार्श्वनाथ ! रक्षां कुरु कुरु स्वाहा " ।
॥ इति कुंभस्थापनादि विधिः ॥
' प्रतिष्ठाने लगतो कार्यक्रम :
सुगंधि जळथी प्रतिष्ठानी भूमिनुं सिंचन करवुः पुप्पनी वृष्टि करवी धूप करवोः प्रतिष्ठा मंडपने यक्षकर्दमथी लपव वेदका स्वस्तिकादिक करवां चित्र-विचित्र वस्त्रोनां चंद्रवा बांधवा. शुभमुहूर्ते प्रतिष्ठाना स्थाने नवीन विबोने लावी सिंहासन उपर पूर्व के उत्तर सन्मुख स्थापना तथा चारे दिशाओमां श्वेत १२ वरघडां मूकवां; चार जवारियां अने आठ arai rai. विनी हथेळीमां प्रियंगुकपूर अने गोरोचंदन मूककुं. पंचरत्ननी पोटली विंनी आंगळीये बांधवी. १ प्रतिष्ठा अंजनशलाकामां जरूरी उपकरणोनी यादी परिशिष्ट-नं. ६ मांथी जोई लेवी.
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