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________________ अञ्जन प्र. कल्प 11 44 11 २ Jain Education I त्या वादळ स्वापीने" शांति घोषणा " करतां स्वस्तिक आलेखवो. पछी साक्षात् मंत्रोच्चार पूर्वक पुष्पांजलि करवी. तथा जिनेश्वर प्रभु तेमज सर्वदेवोने तैयार करवा, पछी १०८ मुद्रानी किंमतना कंकोल, पुष्प, कपूर, अगर अ चंदनी श्रीजिनेश्वर प्रभुना विने स्नान कराव. पछी गीत वार्जित्र करवा. पछी जिनेश्वर परमात्माना अतिशयो याद करवा पूर्वक तीर्थळी स्नान कर. पछी प्रदक्षिणा - पूजा अने देववंदन करी बिंबने वासक्षेप करवो अने शलाका (सळी ) थी अंजन कर. पछी भक्तिपूर्वक ध्वज, चामर, छत्र वगेरे धरवां पछी सर्व अंगे स्पर्श करी उत्तम नैवेद्य धरखां. आ रीते श्री अरिहंत भगवंती पूजा करी सिद्ध महर्षिओ अने श्रावकोने शांति-तुष्टि- पुष्टि आशिष आपवी. ॥२४ थी ३० ॥ पछी मंत्रेला सर्व विसर्जन करी वित्र प्रतिष्ठा करी गुरु शांतिपाठ बोले. ॥३१ ॥ इति प्रतिष्ठाविधिपद्यभाषानुवाद | मां पां वैधृत, व्यतिपात वि. छोडी देवा पूर्वक उत्तममुहूर्त जो. त्यार बाद भूमि शोधन नीचे प्रमाणे करवु : १०८ हाथ प्रमाणनुं " मंगळवर " कर. पछी वरमां तेमज जिनालयमां सुवर्ण जळ लावी नवकार गणी श्रीशांतिनाथ अने पार्श्वनाथ भगवाननुं नाम लेवा पूर्वक "ॐ ह्रीँ अहं भूर्भुवः स्वधायै (स्वधा,) स्वाहा " ए मंत्राक्षरे सावार मंत्री छांट. घरमां तो ते पुष्प-अक्षत अने चंदन सहित पग छंटाय छे. पछी त्यां स्वस्तिक करीने दीपक तथा धूप करवो. त्यार बाद नीचे प्रमाणेना मापनी वेदिका करवी :- (विशेष माप निर्माण कलिकामांथी जोई लेवु.) * अञ्जनादि सर्व विधान प्रतिष्ठा कल्पमां आवतां ३१ श्लोकानुसार भञ्जनशलाकाप्रतिष्ठाविधिनुं संक्षिप्तविवरण ज छे. विधिनो प्रारंभ तो पहेला दिवसना जलयात्राना विधानथी ज थाय छे. For Private & Personal Use Only ॥ ५॥ ainelibrary.org
SR No.600016
Book TitlePratishthakalpa Anjanshalakavidhi
Original Sutra AuthorSakalchandra Gani
AuthorSomchandravijay
PublisherNemchand Melapchand Zaveri Jain Vadi Upashray Surat
Publication Year
Total Pages340
LanguageDevnagri, Gujarati
ClassificationManuscript, Ritual_text, Vidhi, Devdravya, & Ritual
File Size18 MB
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