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________________ आचार दिनकरः ॥ ११६ ॥ Jain Education Intern वायणा संदि० वायणा लेव० कालमां० संदि० कालमां० पडि० सज्झाय पडि० पाभाइअ काल पडि० पं० पद आरो० स्थिरीकरावणि काउकरा० ( जोगमां होय तो संघट्टो आउन्तवाणय लेव० जोगदिन पेसरावणि) पाली तप करशुं करजो-पच्चक्खाण ॥ इत्यादि पवेयणा विधि० ॥ खमा० पूर्वक मंत्र प्रदानं । (उपविधावर्धमानविद्या) नाम ठेवणं ॥ विद्या पट्ट समर्पणं ॥ खमा० सज्झाय ॥ खमा० इच्छ० भग० तुम्हे० मम निसज्जं सम्प्पेह | समप्येमि || पालीनी कामलीनुं स्वस्तिक - केसर छांटावाला उत्तरपट्टा सहित अर्पण करे नाण - तथा गुरुने त्रण प्रदक्षिणा - देशना । वन्दन करे । पछी संघ नूतन पंन्यासने वन्दन करे || खमा० पन्यासपद स्थिरीकरणार्थ काउ० ? लोगस्स० प्रगट लोगस्स० खमा० सचित्तरज० । क्षुद्रोपद्रव काउ० । संघ कपडा व्होरावे | मंत्रनी नवकारवाणी गणे संघसहित देरासर जाय देववंदन करे | SW ॥ उपाध्याय पद प्रदान विधिः ॥ सतिशुद्धि- प्रदक्षिणा - हरिया वही बसही - पवेडं - सुद्धावसही - इत्यादि-खमासमण पूर्वकं आदेश सहितं पूर्ववत् - गुरुः पंचांगरक्षा - अनामिकया अङ्गुल्या स्वस्य- शिष्यस्यापि - (१) मस्तक ( २ ) मुख (द) हृदय (४) नाभि (५) अधोमुखगात्राणि सप्तमुद्रया वासक्षेप मन्त्रयेत् । (१) परमेष्ठि (२) सुरभि (३) सौभाग्य (४) गरुड (५) पद्म (६) मुद्गर (७) करमुद्रया । समवसरणस्थ प्रतिमायां वासक्षेपं "नमोजिणाणं" पूर्वकं For Private & Personal Use Only विभागः २ गणिपद प्रदान विधिः ॥ ११६॥ nelibrary.org
SR No.600003
Book TitleAchar Dinkar
Original Sutra AuthorVardhmansuri
Author
PublisherJaswantlal Girdharlal & Shah Shantilal Tribhovandas Ahmedabad
Publication Year1981
Total Pages566
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript, Ritual_text, & Conduct
File Size11 MB
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