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________________ :: विखरे फूल :: करती नहलाती और सुन्दर वस्त्र पहनाकर हृदयसे लगा लेती है, वैसे ही अनन्त स्नेह(१) भोगोंसे भोगकामनाकी तृप्ति कभी सुधा-समुद्र भगवान् भी तुम्हें अपने हाथों नहीं हो सकती। जैसे अग्निमें घीकी आहुति विशुद्ध बनाकर हृदयसे लगानेको तैयार है। बस, पडनेसे अग्नि बढती है, वैसे हो भोगोंकी निर्भरतायुक्त अनन्य पुकारकी आवश्यकता है। वृद्धिसे भोगकामना बढ़ती है। (९) दूसरोकी उन्नति और सुख-सम्पति (२) भोगकामना जन्मसे लेकर मृत्युकाल- न देख सकना बहुत बडा दोष है। इसमें तक मनुष्यके पीछे लगी रहती है और बिच्छके महान नीच वत्ति और चरम सीमाका स्वार्थ डंक मारने की भांति निरन्तर ऊसे पीडित भरा होता है। वह भाग्यवान पुरुष है जो करती रहती है। दूसरोंकी सुखसम्पति देखकर प्रसन्न होता है। (३) भोगकामनासे छूटना हो तो भोगोंकी (१०) अपनी न्यायकी थोडी कमाइपर मि वृद्धिके फेरमें न पडकर भोगोंका तिरस्कार प्रसन्न होना चाहिये और दूसरेकी कभी करना चाहिये। आशा नही करनी चाहिये। (४) मनको पवित्र और संयत करनेका (११) अपनेको किसी भी क्षेत्रमें बडा दिएक बड़ा सुन्दर और सफल साधन है सत्- खलानेकी चेष्टा नही करनी चाहिये। जो बडा संगमें रहकर निरन्तर महान पुरुषोकी अतु- दिखलानेके फेरमे पड जाता है, वह वस्तुतः लनीय महिमा और पवित्र कथाओंका सुनना कभी बडा बन नहीं सकता। और फिर उनका भलीभांति मनन करते रहना। - (५) साप पुरुषोकी महिमा और लोला- श्रीनित्यस्वाध्याय ५२सग्रह कथाओंके सुनते रहनेसे हृदयके सारे पाप। धुलकर वह निर्मल हो जाता है। पाषाण-हृद- भानपभरणे।, यार ५४२।लाय, यकी कठोरता भी गल जाती है और असाधु छ भथ, मोटर सडी , क्षेत्रसमास, स्वभावमें विलक्षण परिवर्तन होकर सच्ची तत्त्वाधिराम सूत्र, शाति सूत्र, साधुसाधुता आ जाती है। સાથ્વી યોગ્ય આવશ્યક ક્રિયાનાં સૂત્રે, કષી(६) भगवानका मङ्गलमय मधुर गुणगान म स्तोत्र, यश२, मा७२ ५च्या , सुनते और करते समय जिसका चित्त तदाकार धन्द्रिय ५२न्य, वैराग्य शत, सिन्२ ५४२, हो जाता है, शरीर पुलकित हो जाता है गला गौतम स्वाभान रास वोरेन। सड छे. भर आता है और नेत्रों से शीतल जलकी धारा बहने लगती है, वही पुरुष धन्य है। પાકું બાઈન્ડીગ, સુંદર કાગળ, સ્વચ્છ (७) सच्चा ज्ञान तो वही है जो आचर- छा५४ाम, भूस्य २-८-० ॥20मस णमें उतर आया हो। नहीं तो, ग्रन्थोंके रट १ महत। नागास प्रागला लेनेसे क्या होता है। गधा चन्दनका भार ढोता ह पर उसे उसके महत्वका कुछभी पता नहींहोता . शासनाचाणसाभ-सहावा (८) जैसे स्नेहमयी माता बच्चेकी करुण २ सधवा भुलला अवश्य पुकार सुनते ही दौडती है और उसे मलमें जैन सार-पालीता. भरा देखकर अपने हाथों उडाकर धोती, साफ
SR No.539039
Book TitleKalyan 1947 Ank 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSomchand D Shah
PublisherKalyan Prakashan Mandir
Publication Year1947
Total Pages36
LanguageGujarati
ClassificationMagazine, India_Kalyan, & India
File Size9 MB
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