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सभी पूर्ववर्तियों से गणित की इस विधा में महत्वपूर्ण स्थान प्रदान करती है। परन्तु इन सूत्रों को गणित के इतिहास में स्थान देने के लिये डा. ब्रजमोहन ने विनम्र असहमति प्रकट की है। क्योंकि सूत्रों के वैदिककालीन होने और उनके खोज के आंधार की सत्यता असंदिग्ध रूप से प्रमाणित नहीं है।
स्वतंत्रता के पहले स्वामीजी ने अनेक आंदोलनों में भाग लिया। उन्होंने अपना सार्वजनिक जीवन 1905 में गोपालकृष्ण गोखले के निर्देशन में राष्ट्रीय शिक्षा आन्दोलन तथा दक्षिण अफ्रीका की भारतीय समस्या पर प्रारम्भ किया। 9 जुलाई 1921 को करांची में आल इंडिया खिलाफत कान्फ्रेन्स में भाग लेने वाले नेताओं को गिरफ्तार करके करांची में ही राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। गिरफ्तार नेताओं में मुहम्मदअली, शॉकत अली, सैफुद्दीन किचलू, पीर गुलाम, मौलवी हुसैन अहमद, मौलवी निसार अहमद और स्वयं स्वामीजी शामिल
थे ।
ऐसे सर्वधर्म समभाव वाले स्वामीजी ने स्वयं अपनी सूत्राधीन विधियों का भारत के अलावा अमेरिका के अनेक विश्वविद्यालयों में प्रदर्शन करके गणित जगत को आन्दोलित किया। वर्तमान में भी उनके कार्य का विकास एवं प्रचार करने में व्यक्तिगत एवं संस्थागत स्तर पर प्रयास किये जा रहे हैं। राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठानम् नई दिल्ली ( अब उज्जैन) ने वैदिक गणित पर जयपुर, अहमदाबाद और दिल्ली में कार्यशाला तथा गोलमेज चर्चा आयोजित की थी। अभिनव विद्या भारती, बैंगलोर और महर्षि महेश योगी संस्थान भी कार्य कर रहे हैं। आध्यात्मिक अध्ययन संस्था, रूढ़की के डा. नरेन्द्र पुरी इस दिशा में गंभीर रूप से प्रयासरत हैं। लंदन के निकोलस और उनके साथियों ने स्वामीजी के सूत्रों का कार्यक्षेत्र बढ़ाया है। फलस्वरूप स्वामीजी की इन सूत्राधीन विधियों को भारत के अलावा इंगलैंड, अमेरिका, जापान आदि देशों में पढ़ना प्रारम्भ किया गया है। देश के प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं गणित के इतिहासकार प्रो. आर. सी. गुप्त, जे. एन. कपूर, कृपाशंकर शुक्ल, टी.एस. भानुमूर्ति आदि ने स्वामीजी की कृति का महत्वपूर्ण विवेचन किया है, जो हमें भ्रम से बचाता है।
स्वामीजी की सूत्राधीन विधियों का शैक्षणिक मूल्य है। इनसे गणित के आनन्दमय सौन्दर्य का बोध होता है, जो गणितसे भयभीत शिक्षार्थियों को गणित अध्ययन की मुख्य धारा में ला सकता है। परन्तु इन्हें नियमित शिक्षण का अंग नहीं बनाया जा सकता। क्योंकि अंकगणित या बीजगणित के मात्र कुछ अंशों में द्रुतगति से परिणाम प्राप्त करना ही गणित नहीं है। गणित एवं गणना आज समानार्थी शब्द नहीं रहे हैं। स्वामीजी के सूत्राधीन विधियों में प्राचीन शिक्षण पद्धति के दोष हैं। सूत्रों के आगमन तर्क से अनभिज्ञ होने पर कोई भी अशुद्धि करने को बाध्य होता है। कण्ठस्थ करना और उनका अनुप्रयोग बिल्कुल यन्त्रवत होता है। ऐसा लगता है जैसे कोई जादू हो । स्वयं स्वामीजी के अनुसार जब तक न समझ में आये तब तक जादू और तत्पश्चात् गणित । स्वामी प्रत्यगात्मानन्द सरस्वती के अनुसार परिणाम निकालने में तो जादू का उपयोग किया जा सकता है। परन्तु प्रमाणित करने के लिये तर्क का उपयोग ही करना पड़ेगा। यह जादू कुछ और नहीं वरन् निगमन विधि का अनूठा प्रयोग है।
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गणित में स्वामीजी की यह शैली अनुपम है। उनकी इस शैली का अनुप्रयोग ऐसे विषयों में किया जाये जहाँ वह सहवर्ती हो। उनके कार्य के विकास की यही दिशा निःसन्देह उनके चरणों में सही वन्दना होगी।
अर्हत् वचन, अप्रैल 2000
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