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में भगवान ऋषभदेव से संबंधित पुस्तकों एवं पाठों को स्कूल शिक्षा के पाठ्यक्रम में सम्मिलित कराने का आश्वासन दिया। आपने कहा कि भगवान ऋषभदेव अयोध्या में जन्मे थे और उन्होंने यहां हस्तिनापुर में आकर अन्न ग्रहण किया था। यह उन्हीं का वैभव है कि हस्तिनापुर में ज्ञानमती माताजी के सान्निध्य में कुलपति सम्मेलन हो रहा है। उन्होंने कहा कि माताजी ने कुलपतियों का जो आह्वान किया है कि वे अपने विश्वविद्यालयों में वर्ष में एक दिन भगवान ऋषभदेव के नाम पर चर्चा करने के लिए गोष्ठी करें, यह अच्छा तरीका है जिससे भगवान ऋषभदेव का भरपूर प्रचार हो सकता है। उन्होंने कहा कि हस्तिनापुर में दुनिया का सबसे बड़ा अपराध हुआ था। यहां नारी का चीर हरण किया गया था लेकिन अब उक्त अपराध का प्रायश्चित हो चुका है। जिस तरह से अहिल्याबाई का उद्धार भगवान राम के चरणों से हुआ था उसी तरह यहां ज्ञानमती माताजी की कृपा से हस्तिनापुर नगरी का उद्धार होना शुरू हो गया है। जैन समाज के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के पुत्र भरत हुए हैं जिनके नाम पर इस देश का नाम भारत पडा है। उन्होंने कहा कि इस राष्ट्र की जड़ धर्म है समाज तना है और राजनीति पेड़ की शाखायें है जो कटती रहती हैं। इन शाखों के कटने से कोई फर्क नहीं पड़ता।
पूज्य आर्यिका श्री अभयमती माताजी ने पूज्य माताजी के जन्मदिन पर अपनी विनयांजलि अर्पित करते हुए कहा कि पूज्य श्री ज्ञानमती माताजी ने अपने जीवन में जो कार्य किये हैं उनकी प्रशंसा शब्दों में नहीं की जा सकती। आपने कहा कि पूज्य माताजी के कृपा प्रसाद से हम सभी शिष्याएँ रत्नत्रय की साधना में लगी हैं। आपका इसी प्रकार से आशीर्वाद हम सभी को एवं समाज को मिलता रहे ऐसी भगवान से प्रार्थना है।
पू. ज्ञानमती माताजी ने अपने जन्म दिवस पर कहा कि आज उनका जन्म दिवस नहीं त्याग दिवस है क्योंकि उनका जन्म 1934 में टिकैतनगर बाराबंकी में हुआ था। लेकिन उन्होंने 1952 में सब कुछ त्याग करने का संकल्प किया था वह उनका जन्म दिवस है इसलिए उनका आज 47 वां त्याग दिवस है। उन्होंने कहा कि ऋषभदेव ने अपने उपदेश में अधीनस्थ राजाओं को राजनैतिक उपदेश देकर उनको ज्ञान प्राप्त कराया। इसी के साथ शिक्षा में भी उनका अमूल्य योगदान है। जैन शास्त्रों में शिक्षा के सभी प्रकारों का वर्णन है। उन्होंने कहा कि मैसूर में जैन धर्म पर शोध होते रहे हैं। विश्वविद्यालयों में जो पाठ्यक्रम की पुस्तकें है उनमें एक पाठ भगवान ऋषभदेव के विषय में अवश्य रखवाया जाये। उन्होंने कहा कि आज की राजनीति में धर्म को अलग रखने से उथल-पुथल है। धर्म को अलग करने से ही उसमें दोष उत्पन्न हो गए हैं अगर राजनीति के साथ धर्म का समावेश हो तो राजनीति के गिरते स्तर को रोका जा सकता है। इसी कारण राजनीति में धर्म गुरुओं का सान्निध्य होना चाहिए। जन्म जयंती कार्यक्रम के अवसर पर ही तीर्थंकर ऋषभदेव राष्ट्रीय विद्वत् महासंघ की स्थापना की घोषणा की गई। इस महासंघ के माध्यम से भगवान ऋषभदेव की शिक्षाओं का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जायेगा। संस्थापक अध्यक्ष एवं महामंत्री के रूप में डा. प्रेमसुमन जैन, उदयपुर तथा डा. अनुपम जैन, इन्नौर का मनोनयन किया गया। डा. शेखरचन्द्र जैन, अहमदाबाद कार्याध्यक्ष तथा कर्मयोगी ब्र. रवीन्द्रकुमार जैन, हस्तिनापुर एवं डॉ. भागचन्द्र जैन 'भास्कर', नागपुर को परामर्शदाता मनोनीत किया गया। भोजनोपरांत रात्रि में विनयांजलि सभा का आयोजन किया गया जिसका संचालन डा. शेखरचन्द्र जैन अहमदाबाद ने किया। रात्रि 7.30-10.30 तक चली इस सभा में 40 विद्वान वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किये। जन्म जयन्ती के अवसर पर भक्तों द्वारा अनेक प्रकार के उपहार भी वितरित किये गये। 6.10.98, प्रात: 8.00 - 11.30, षष्ठम एवं समापन सत्र
अध्यक्षता - कर्मयोगी ब्र. रवीन्द्रकुमार जैन, अध्यक्ष - दि. जैन त्रिलोक शोध संस्थान, हस्तिनापुर मुख्य अतिथि - प्रो. एम. एल. रंगा, कुलपति-कुरुक्षेत्र वि.वि., कुरुक्षेत्र (हरियाणा) विशिष्ट अतिथि- प्रो. पी.एन. मिश्र, निदेशक - देवी अहिल्या वि.वि., इन्दौर
प्रो. सुरेशचन्द्र अग्रवाल, संकायाध्यक्ष - चौधरी चरणसिंह वि.वि., मेरठ
अर्हत् वचन, जनवरी 99