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________________ सोमप्रभ को बनाया, भगवान ने पुत्र भरत को कलाएँ सिखाई। भरत के पुत्र अर्ककीर्ति से राज्य देकर दीक्षा लेने की परम्परा रही है। जबसे राजनीति में धर्म का पुट कुलगुरुओं का मार्गदर्शन हट गया है तभी से राजनीति भ्रष्ट हो गई है। विद्वानों एवं कुलगुरुओं का दिशादर्शन आज की राजनीति में प्राप्त हो जावे तो निश्चित ही उसमें स्थिरता आयेगी । इसी पवित्रधरा से भगवन्तों ने पहले अपने सुदर्शन चक्र से शत्रुओं को जीता, पुनः ध्यान चक्र से कर्मशत्रुओं को जीतकर कैवल्य प्राप्त किया, अतः यहाँ होने वाला प्रत्येक आयोजन निर्विघ्न सम्पन्न हो जाये, इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। अध्यक्षता संचालन मंगलाचरण वक्ता सम्मेलन में आगत समस्त कुलपतियों को प्रेरणा देते हुए पूज्य माताजी ने आगे कहा कि सभी विश्वविद्यालयों में वर्ष में एक दिन 'ऋषभदेव समारोह' के नाम से एक संगोष्ठी आयोजित की जाये और संस्थान द्वारा प्रकाशित समस्त जैन साहित्य विश्वविद्यालयों में हस्तिनापुर से पहुँचाया जाये। डॉ. अनुपम जैन, मंत्री ने सभी का आभार माना । दिनांक 5. 10.98, दोपहर 1.00 3.30, पंचम सत्र - - - नृत्य संगीत विद्या सिखाई, पुनः सभी पुत्रों को अनेक सूर्यवंश चला है और उस वंश में अपने पुत्रों को - - प्रो. एस. एन. हेगडे, कुलपति मैसूर वि. वि. मैसूर डा. नलिन के. शास्त्री, कुलसचिव मगध वि.वि., बोधगया डा. कमलेश कुमार जैन, प्राध्यापक बनारस हिन्दू वि.वि., वाराणसी प्रो. मुनियम्मा, कुलपति गुलबर्गा वि.वि., गुलबर्गा 'Impact of Jainism on Hyderabad & Karnataka Region'. - - - - प्रो. शरद भांड, पूर्वकुलपति म.प्र. भोज मुक्त वि.वि., भोपाल 'प्रथम शिक्षाविद् भगवान ऋषभदेव' - प्रो. आर. आर. नांदगांवकर, पूर्वकुलपति विक्रम वि.वि., उज्जैन 'पर्यावरण विज्ञान के जनक- भगवान ऋषभदेव' - - प्रो. बलबीरसिंह भसीन, प्रतिकुलपति मगध वि. वि. बोधगया "विभिन्न धर्मो में अहिंसा' प्रो. मुनियम्मा ने अपने उद्बोधन में आन्ध्र एवं कर्नाटक क्षेत्र में फैले जैन संस्कृति के पुरावशेषों के आधार पर यह प्रतिपादित किया कि इन क्षेत्रों के जनजीवन एवं संस्कृति पर जैन तीर्थंकरों एवं आचार्यों की शिक्षा का व्यापक प्रभाव है। उन्होंने तर्कपूर्ण ढंग से यह प्रतिपादित किया कि जैन धर्म अति प्राचीन हैं तथा इसके तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव हैं। · प्रो. शरद भांड ने भी प्रथम शिक्षाविद् के रूप में जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के योगदान की विस्तृत विवेचना प्रस्तुत की। उन्होंने इस भारत भूमि को ग्राम, नगर, खेट, कर्वट, मतम्ब, पत्तन, द्रोणमुख तथा संवाहन में विभाजित कर सुयोग्य प्रशासनिक न्यायिक अधिकारों से युक्त राजा, मण्डलीक, किलेदार, नगर प्रमुख आदि के सुपुर्द किया। मानव पूर्ण संतुष्ट कभी नहीं रह सकता है। इस व्यवस्था से नियमों के विरुद्ध कार्य करने वालों के लिये 'हाँ' ( खबरदार, डॉट लगाना) मा ( फिर न करना) तथा धिक ( धिक्कार हो), बारबार समझाने पर भी पुन: पुन: इस प्रकार के कार्य करते हो, इसलिये धिक्कार, बहिष्कार आदि की दण्ड संहिता भी लागू की थी। कालांतर में देह बन्धन, कारागृह, वध, देश निकाला आदि संहिताएँ उसमें जुड़ गई। आपने कहा कि अल्पसंख्यक एवं बहुसंख्यक के रूप में भेद नहीं किया जाना चाहिये नियम सबके लिये समान हो भेद का निर्माण न करें सबको समानता का अधिकार मिले आपने पोखरण के परमाणु विस्फोट को शक्ति प्रदर्शन की संज्ञा प्रदान करते हुए कहा कि शक्तिमान ही अहिंसा अर्हत् वचन, जनवरी 99 87
SR No.526541
Book TitleArhat Vachan 1999 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages112
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size8 MB
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