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पुस्तक समीक्षा THE JAIN SANCTUARIES OF FORTRESS OF GWALIOR
The Jain Sanctuaries of Fortress of Gwalior by Dr. T.V.G. Sastri, Published by Kundakunda Jnanapitha, 584, M. G. Road, Indore - 452 001, Rs. 500 = 00, PP. XII + 140. Plates 24, Size A/4
Reviewed by Dr. Shailendra Rastogi, Ex - Director, Rama Katha Samgrahalaya, Ayodhya. Res.- Saparya, 223 / 10, Rastogi Tola, Raja Bazar, Lucknow.
राज्य संग्रहालय - लखनऊ के पुरातत्व अनुभाग, जिसका मैं सुदीर्घकाल तक सहायक निदेशक रहा हूँ, के संग्रह में दो शिलालेख सास- बह मन्दिर ग्वालियर के हैं।
प्रथम शिलालेख सम्वत् 1161 का है। (राज्य संग्रहालय संख्यक E/16, 5' x 37" x 11/2" लेख नौ पंक्तियों में है) ग्वालियर के सास-बहू मन्दिर के इस अभिलेख में कच्छप घाट के शासकों की वंशावली के साथ ही शिव मन्दिर का वर्णन है। इस शिलालेख का प्रणेता 'निर्गन्थ नाथ' यशोदेव का अभिन्न मित्र है। इस लेख को कनिधम महोदय ने ग्वालियर के उर्वाही द्वार में पाया था। इस लेख का प्रकाशन श्री आर. एल. मित्र और प्रोफेसर हूल्स ने किया है।
दसरा अभिलेख सम्वत् 1165 का है। (राज्य संग्रहालय संख्यक E/17, 2' x 872" x 1'11" लेख नौ पंक्तियों में है) इसमें कच्छप घाट के सूर्यपाल एवं महिपाल का उल्लेख है। इसे रतनपाल की प्रार्थना पर उत्कीर्ण करवाया गया है। इसमें जैन मन्दिर के निर्माण के विषय में ज्ञात होता है। चूंकि शिलालेख काफी समय तक खुले स्थान पर रहा अत: इसके अक्षर पर्याप्त घिस चुके हैं। ये लेख अब तक अप्रकाशित ही हैं।
इन अभिलेखों के कारण मेरे अन्तर्मन में ग्वालियर के जैन वैभव के दर्शन की अभिलाषा सुषुप्तावस्था में विद्यमान थी। अब मुझे यह लिखने में रंचमात्र भी संकोच नहीं है कि लब्ध प्रतिष्ठित पुराविद डॉ. टी. वी. जी. शास्त्री विरचित 'दी जैन सेन्चरिज ऑफ दी फोर्टस ऑफ ग्वालियर' (The Jain Sanctuaries of the Fortress of Gwalior) पुस्तक से मेरे मन में ग्वालियर किले के जैन पुरा वैभव को घर बैठे देखने का चिरपोषित स्वप्न साकार हो गया है।
हण शासक मिहिर के अभिलेख में उल्लिखित 'गोप भूधर' का क्षेत्र ही आज का ग्वालियर का भूभाग है। इसी गोपाचल की गुफाओं के छिपे हुए जैन कला रत्नों से प्रस्तुत पुस्तक चमत्कृत है। कला एवं पुरातत्व के तलस्पर्शी ज्ञाता ने मात्र इस परिसर में विकीर्ण जैन कला सम्पदा ही नहीं निरूपित किया है, अपितु ग्वालियर की भौगोलिक स्थिति, पूर्ण ऐतिहासिक दशा, इस स्थल की प्राचीन एवं मध्यकालीन ऐतिहासिकता, तोमर शासकों की जैनों को देन, जैन गुफाओं के वर्णन के साथ इनके वर्गीकरण, गोपाचल की जैन मूर्तियों पर कला का प्रभाव यहाँ पर उत्कीर्ण शिलालेख, यहाँ की गुफाओं का वास्तुशिल्प एवं जैन प्रतिमाओं का शास्त्रीय विवेचन किया है। इनके साथ ही प्रतिमा विज्ञान एवं शिल्प शास्त्र के खास शब्दों के हिन्दी अर्थ, नक्शें एवं स्केचों के द्वारा विषय को अति सुगम बनाया गया है। प्रत्येक अध्याय के साथ संदर्भ ग्रन्थों का भी उल्लेख एवं अन्त. में इन्डेक्स दिया गया है।
प्रस्तुत पुस्तक में पाठक के समक्ष ग्वालियर किले में अवस्थित अर्हन्त प्रतिमाओं के नयनाभिराम चित्रों की मानव मंजूषा खुल जाती है। इस अनुपम रचना के लिये विद्वतरेण्य शास्त्रीजी हार्दिक बधाई के पात्र हैं। मेरे विचार से जहाँ यह ग्रन्थ कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर का बहुमूल्य प्रकाशन है। वहीं इस ग्रन्थ हेतु वित्तीय अनुदान देकर श्रीमती रमादेवी एवं बिहारीलाल दिगम्बर जैन ट्रस्ट, ब्लूफील्ड (अमेरिका) भी धन्य हो गया है।
अर्हत् वचन, जनवरी 99