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वह भी विक्रम की प्रथम शताब्दी के कुछ समय पूर्व से।
वीर निर्वाण के पश्चात् दशम शती में श्वेताम्बरों ने जो पाटलीपुत्र, माथुरी और वलभी वाचनाओं द्वारा उस समय की अपनी भाषा में अंगों का संकलन किया उनकी भाषा को अर्द्धमागधी नाम दिया गया और षट्खंडागम, कसायपाहुड़ से प्रारम्भ कर 'समयसार', 'धवला' आदि की जो दिगम्बर आचार्यों द्वारा रचना हुई, उनकी भाषा को शौरसेनी नाम दिया गया।
आचार्य पूज्यपाद ने सर्वार्थसिद्धि 10 में लिखा है कि आरातीय - आचार्यों ने काल दोष से संक्षिप्त आयु, मति और बलशाली शिष्यों के अनग्रहार्थ दशवैकालिक आदि ग्रन्थों की रचना की। ये अर्थ की दृष्टि से सूत्र ही हैं। यहाँ शब्द रचना को छोड़कर अर्थ की दृष्टि बताई गई है। ग्रंथ रचना का नियम यह है कि लेखक जब जिस देश में रहता है वहाँ की प्रचलित भाषा का वह उपयोग करता है उसके उच्चारण भी उसी प्रकार के होते हैं। श्वेताम्बर अंगग्रन्थों के सम्बन्ध में डॉ. हीरालालजी ने उक्त अपने ग्रंथ में लिखा है 11 कि श्वेताम्बर आगम ग्रंथों में प्राक्तन अर्द्धमागधी का स्वरूप नहीं मिलता। भाषा शास्त्रियों के मतानुसार वर्गों के विपरिवर्तन की प्रक्रिया, भाषा सरलीकरण, युगानुसार प्रवृत्तियों के प्रभाव से तथा कालानुसार मौखिक परम्परा के कारण भिन्नता आती रहती है। इस भिन्नता से भाषा की भिन्नता होने पर उस भाषा के ग्रंथों की शब्द भिन्नता का अनुमान किया जा सकता है। इसी कारण प्राकृत के भी मागधी, अर्द्धमागधी, शौरसेनी, महाराष्ट्रीय, पैशाची आदि भेद हो गये और पीछे प्राकृत व्युपत्ति में आचार्य हेमचन्द्र के मतानुसार जिसकी प्रकृति संस्कृत से है उससे आगत प्राकृत है। यहाँ आचार्य का अभिप्राय यह है कि इसके व्याकरण हेतु संस्कृत रूपों को आदर्श मानकर प्राकृत शब्दों का अनुशासन किया गया है। संस्कृत की अनुकूलता हेतु प्रकृति को लेकर प्राकृत के आदेशों की सिद्धि की गई है।
Comparative Grammer (कम्परेटिव ग्रामर), भूमिका में हार्नले ने लिखा है 12 कि अर्द्धमागधी का रूप गठन मागधी और शौरसेनी से हुआ है। प्राकृत भाषा के दो वर्ग हैं, एक वर्ग शौरसेनी बोली है और दूसरे में मागधी प्राकृत बोली है, इनके मध्य में एक रेखा उत्तर में खिंचने पर खालसी से वैराट, इलाहाबाद और दक्षिण में रामगढ़ से जोगढ़ तक है। इस प्रकार शनै: शनै: ही दोनों प्राकृतें मागधी और शौरसेनी मिलकर तीसरी अर्द्धमागधी बन गई। यही बात प्रियर्सन ने अपनी पुस्तक Seven Grammers of the Dilectors (सेवन ग्रामर्स ऑफ दी डाइलेक्टर्स) में लिखी है। प्राचीन भारत में शौरसेनी और मागधी दो ही भाषा थी। वर्तमान में श्वेताम्बर आगम साहित्य में जो ग्रंथ अर्द्धमागधी में उपलब्ध हैं, वह अर्द्धमागधी तीर्थंकर महावीर की दिव्यध्वनि की भाषा नहीं है। इसका रूप तो चौथी पांचवीं शताब्दी में गठित हआ है। दिव्यध्वनि का भाषात्मक रूप आर्य-अनार्य आदि वर्ग की विभिन्न भाषाओं द्वारा ग्रथित होता है। आचार्यों ने अठारह लघुभाषाओं का मिश्रण इसमें माना है। भाषा का यह रूप सभी स्तर के प्राणियों को बोध्य है 131
उक्त प्रमाणों से लेखक महोदय को अपनी चिन्ता दूर कर लेनी चाहिये। नाम की समानता से वर्तमान अर्द्धमागधी तीर्थंकरों के उपदेश की भाषा नहीं हो सकती।
प्रबुद्ध पाठक जानते ही हैं कि परम पूज्य आचार्य विद्यानन्दजी मुनि महाराज के शुभाशीर्वाद से शौरसेनी प्राकृत की प्राचीनता, प्राकृत में उसकी प्रमुखता, व्याकरण की रचना, दिल्ली विश्वविद्यालय में उसकी पाठ्य पुस्तकों में स्वीकृति और स्वतंत्र रूप से वहाँ कार्य अर्हत् वचन, जनवरी 99
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