SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 39
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अर्हत् वच न्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर वर्ष - 11, अंक 1 जनवरी 99, 3744 भ्रदबाहु : जैन इतिहास का दीपस्तंभ ■ सूरजमल बोबड़ा 600 से 321 ई. पूर्व के काल पर विचार करें तो लगभग 600 ई. पूर्व तक उत्तरी भारत में प्रजातन्त्रों एवम् राजतंत्रों की स्थापना के साथ भारतीय इतिहास के विवरण अधिक प्रामाणिकता के साथ उपलब्ध होने लगते हैं। जबकि राजतंत्र गंगा के मैदानों में केन्द्रित थे, प्रजातंत्र इन राज्यों की उत्तरी परिधि के चारों ओर हिमालय की तलहटियों में और उनके कुछ दक्षिण में तथा आधुनिक पंजाब के अंतर्गत उत्तरी-पश्चिमी भारत में बसे हुए थे। वैदिक कट्टरता के विरूद्ध प्रजातंत्रों के लोगों ने अपनी प्राचीनतर और अनवरत चली आती परम्परा को अक्षुण्ण रखा था । यह अनवरत चली आती परम्परा जन संस्कृति थी जो संभवतः भारत की मूल संस्कृति थी । यदि पूर्णतः इसका अध्ययन हो जाय तो जैन इतिहास की लुप्त धारा तक पहुँचा जा सकता है। जन संस्कृति के पतन तथा कृषि अर्थव्यवस्था पर बढ़ती निर्भरता से राजतंत्रों के विकास को प्रोत्साहन मिला। गंगा के मैदान पर प्रभुत्व रखना सामरिक तथा आर्थिक दोनों ही दृष्टि से लाभप्रद था अतः 4 राज्यों में प्रतिद्वंदिता थी। इनमें से तीन काशी, कोसल (काशी के पूर्व में स्थित) और मगध ( आधुनिक दक्षिणी बिहार ) राजतंत्र थे तथा वृजी (नेपाल में जनकपुर तथा बिहार का मुज्जफ्फर जिला) प्रजातंत्र लगभग 100 वर्षों तक इनमें युद्ध चलता रहा। मगध अंततः विजयी हुआ। मगध का पहला महत्वपूर्ण राजा बिंबिसार था। छठी शताब्दी ई. पूर्व के उत्तरार्ध में बिंबिसार मगध का राजा बना। कुशल प्रशासन, सीमा व व्यापार का विस्तार, मैत्री और पारिवारिक संबंध स्थापित कर अन्य राज्यों से अच्छे संबंध, खेती विस्तार व कर संग्रह की व्यवस्था ने राज्यकोष को समृद्ध बनाया । बिंबिसार के पुत्र अजातशत्रु ने, जो मगध पर शासन लगभग 493 ई. पूर्व में अपने पिता की हत्या कर दी और ने राजगृह को सृदृढ़ किया और गंगा के पार्श्व में पाटलिग्राम का निर्माण कराया। आगे चलकर यह मौर्यों की सुप्रसिद्ध राजधानी पाटलीपुत्र बना । करने के लिए आतुर था, राजा बन गया। अजातशत्रु नामक एक छोटे से दुर्ग मगध की विजय, राजतंत्री पद्धति की विजय थी जो अब गांगेय प्रदेश में दृढ़ता से स्थापित हो गई थी । * 9 / 2, स्नेहलतागंज, इन्दौर 461 ई. पूर्व में अजातशत्रु का देहांत हो गया। उसके पश्चात पाँच राजा सिंहासन पर बैठे और सब पितृहंता थे। इससे मगध की प्रजा अत्यन्त क्षुब्ध हो गई और उन्होंने 5 वें राजा को 413 ई. पूर्व में राज्यच्युत करके एक राज्यपाल शिशुनाग को राजा नियुक्त किया। शिशुनागवंश ने केवल आधी शताब्दी तक ही राज्य किया था कि महापद्मनंद ने राज्य पर अधिकार कर लिया। भारतीय इतिहास के निर्माण में मगध, विशेषतया उसके नन्द राजाओं का महत्वपूर्ण
SR No.526541
Book TitleArhat Vachan 1999 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages112
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size8 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy