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वर्ष - 11, अंक - 1, जनवरी 99, 17 - 20
अर्हत् वचन कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर
जैन संस्कति की पोषक सराक प्रजाति
- अभयप्रकाश जैन *
अनेक अधिकारी विदेशी और भारतीय विद्वान जैनमत को प्राचीनतम जीवित धार्मिक परम्परा मानते हैं क्योंकि उसमें आदिम युग में जन्मी प्रकृति वादी, सर्वजीव वादी, पर्यावरण संरक्षण वादी, अहिंसावादी पूर्व मान्यतायें आज भी जीवित रूप से मौजूद हैं। जैन परम्परा निश्चय ही अवैदिक है। ऋषभदेव से महावीर स्वामी तक जो छठी शताब्दी ई.पू. के पूर्व इतिहास पुरुष थे। चौबीस तीर्थकर मनीषियों ने इस परम्परा का मार्गदर्शन किया। वैदिक कर्मकाण्ड तथा औपनिषदिक ब्रह्मवाद इसे सामान्य रूप से अमान्य है। अस्तित्व के दु:खमय होने की तीव्र एवं त्रासदायी अनुभूति व्यक्तिगत प्रयत्नों द्वारा उससे मुक्ति की संभावना में विश्वास तथा परिकल्पना जैनमत में ही है।
संस्कृति के प्रजातीय उद्गम स्रोतों को समझने के लिये प्रजाति विषयक मूलभूत अवधारणा को समझ लेना आवश्यक है। प्रजाति मानव समुदाय के एक विशिष्ट ऐतिहासिक रूप का द्योतक है जो कि मानवों के एक विशिष्ट सामाजिक संगठन द्वारा निर्मित होता है और उनके सामाजिक अस्तित्व की विशिष्टता को चरितार्थ करता है और विकसित होता है। एक प्रजातीय समुदाय अपने सदस्यों के प्रत्यक्ष सम्बन्धों के माध्यम संरूपाकार ग्रहण करता है। एक प्रजाति का एक भाषा के साथ निकट का सम्बन्ध होता है फलत: भाषा प्रजाति के सर्वाधिक महत्वपूर्ण वस्तुन्मुखी लक्षण के रूप में ही नहीं वरन् उसके सदस्यों के पारस्परिक सम्बन्धों के प्रतीक के रूप में भी स्थिर रहती है। एक प्रजाति के सदस्यों की सांस्कृतिक एकता अखंडनीय होती है।
सराक प्रजाति एक एकीकृत मानव समूह है जो अपनी एकता को स्वीकार करता है और अन्य जनजातियों, मानव समूहों से अपनी भिन्नता के प्रति जागरूक रहता है। एक प्रजाति के सदस्यों में व्याप्त एकता की ऐसी चेतना सामान्यत: प्रजातीय आत्म चेतना या सारूप्यता कहलाती है। एक प्रजाति की सारूप्यता उसके सदस्यों की जन्मभूमि, मातृभाषा, सांस्कृतिक एवं मानसिक विशिष्टता तथा वंश परम्परा एवं इतिहास से सम्बद्ध सारूप्यता पर आधारित रहती है। इस प्रकार एक प्रजाति को एक ऐसे स्थिर मानव समूह के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसका इतिहास एक विशिष्ट भूभाग से सम्बद्ध रहा हो जिसके सदस्य भाषा, संस्कृति, खानपान, मानसिकता की दृष्टि से एक हो और अपनी तद विषयक एकता तथा अपने जैसे अन्य मानव समूहों से अपनी तरंगतर भिन्नता के प्रति जागरूक हों और जिसका अस्तित्व एक निश्चित नाम संसूचित किया जा सकता हो। सराक प्रजाति भगवान पार्श्वनाथ एवं वर्द्धमान को कुल देवता मानती है।
बिहार सराक बहुल क्षेत्र है जहाँ की शुष्क आबोहवा ने संतों को इस स्थल में विचरण के लिये विशेष रूप से प्रेरित किया है। कारण नमी का अभाव जीवों की बहुलता को रोकता है। जरा सोचिये तो जहाँ संत विचरें, कैसा विवेक प्रधान होगा यह क्षेत्र ? छोटे-मोटे जीवों को भी बचाने में कितना प्रयत्नशील ? यहाँ जैन श्रावकों का सदैव वर्चस्व रहा है तभी तो तीर्थकरों, आचार्य, उपाध्याय, मुनियों ने यहाँ सदैव बहुलता से विहार / विचरण किया है। सराक शब्द श्रावक का बिगड़ा हुआ रूप
सराक जाति के लोग ब्राह्ममुहूर्त में उठते हैं, चारपाई से उठते समय णमोकार मंत्र जपते हैं और चारपाई उठाकर खड़ी कर देते हैं। चारपाई बिस्तर भी बिन बिछे नहीं रहती। सर्वप्रथम पानी
* एन - 14, चेतकपुरी, ग्वालियर - 474009