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है। सर्वप्रथम विनाश संभवत: राजा शशांक (600 ई. से 625 ई.) ने किया। पश्चात् राजेन्द्र (चोलवंशी प्रारभिंक ग्यारहवीं शताब्दी) ने सुमात्रा, जावा आदि के अपने विजय अभियान के अन्तर्गत जाते समय व आते समय किया। उसके बाद जैन संस्कृति के अनुकूल वातावरण कभी नहीं रहा। वर्तमान में पंथ निरपेक्ष सरकार द्वारा बनाये जा रहे दामोदर बांध के निर्माण में जो भूमि डूब क्षेत्र में आ गई, वहां हमारी संस्कृति के प्राचीन अवशेष प्रचुर मात्रा में थे। अनेकानेक रूप में धर्म के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने वाले जैन लोगों को अपने इन अवशेषों की रक्षा के लिए सोचना ही चाहिए। शायद दुनिया में कोई भी देश और समाज अपनी संस्कृति के प्रति इतता उदासीन नहीं है जितना हमारा दिगम्बर जैन समाज। पुरातत्व महत्व की सामग्री जैन मंदिरों से रहस्यमय ढंग से गायब होती रहती है। उनके चोरी हो जाने या अन्य प्रकार से नष्ट हो जाने या खण्डित हो जाने की घटनाए अब साधारण बात 'हो गई है। दिगम्बर - श्वेताम्बरों के झगड़ों व मुकदमों में (राजस्थान में केसरिया जी काण्ड (1919) से आरंभ होकर वर्तमान सम्मेदशिखर विवाद तक) कितना पैसा लगा है जैनों का? आधुनिकीकरण के इस युग में हमने अपने पञ्चकल्याणकों व अन्य उत्सवों का जो स्वरूप बना लिया है उनमें कितना खर्च अनावश्यक है हमें इन सबका विचार करना चाहिए। हमने अपने विवेक प्रधान धर्म को श्रद्धा और सरलता की भावना में कितना मिथ्यात्वरूप दे दिया है? राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियों में हमारी ही पीड़ा छुपी है।
जिन श्रेष्ठ सौधों पर सुगायक श्रुति थे धोलते। निशी मथ्य टीलों पर उन्हीं के आज उल्ल बोलते॥ सोते रहो रे जैनियों! हम मौज करते हैं यहाँ। प्राचीन चिन्ह विनष्ट यों किस जाति के होंगे कहाँ।
सन्दर्भ ग्रंथ - 1. Lt. Col. E. T. Dalton, Journal of Asiatic Society of Bengal, Volume XXXV,
Part I, Page 1866, द्वारा सराक ज्योति - अक्टूबर 98, पृ. 20 2. भारत के दिगम्बर जैन तीर्थ, भाग-2, पं. बलभद्र जैन, भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी,
बम्बई-4, 1975 3. प्राच्य जैन सराक शोधकार्य - पं. बाबूलाल जैन जमादार, भा. दि. जैन शास्त्री परिषद, बड़ौत, 4. जैन गजट, 1925 5. डा.स्नेहरानी जैन, भारत के महावीर पूर्वकालीन जैन गुफा मन्दिर, अर्हत् वचन (इन्दौर), 10 (4),
अक्टूबर 98, 55 - 62 6. देखें सन्दर्भ-1 7. तित्थयर (कलकत्ता) (सराक विशेषांक) वर्ष-22, अंक-1, अप्रैल 1998, जैन धर्मावलम्बी राढ़
क्षेत्र की सराक जाति, पृ. 23 - 33 एवं भगवान महावीर की सिद्धभूमि, पृ. 107 - 122, विशेष
दृष्टव्य पृ. 113 8. सराक क्षेत्र, डा. नीलम जैन, सराक साहित्य संस्थान, दिल्ली, 1996 9. हरिवंशपुराण, आचार्य जिनसेन, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, 1994, 8/66 10. देखें सन्दर्भ-2 11. देखें सन्दर्भ -1
प्राप्त - 2.11.98
अर्हत् वचन, जनवरी 99