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________________ कोई भी पत्रिका अपने सम्पादक के नाम - गुण को प्रतीकित करने वाली होती है। यह आपकी सम्पादकीय मनीषा से मण्डित अर्हत् वचन के गत अंक से स्पष्ट है। अनुपम द्वारा सम्पादित पत्रिका अनुपम होगी ही। आपकी इस त्रैमासिकी से जैन चिन्तन को नई दिशा मिल रही है। आज की प्राय: अधिसंख्य जैन पत्रिकाएँ पिष्ट - पेषण का ही काम ज्यादा कर रही हैं किन्तु अर्हत् वचन त्रैमासिकी जैनधर्म - दर्शन को जीवन जीने की प्रक्रिया के रूप में जिस वैज्ञानिकता के साथ प्रस्तुत कर रही है वह अतिशय श्लाघ्य और साधुवाद के योग्य है। विद्यावाचस्पति डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव पी. एन. सिन्हा कालोनी, मिखनापहाड़ी, पटना-800006 अक्टूबर 98 का अर्हत् वचन का अंक मिला। पत्रिका पूरी पड़ी। कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ के प्रकाशनों की सूची देखी। डॉ. टी.वी.जी. शास्त्री की 'Jain Sanctuaries of the Fortress of Gwalior एक महत्वपूर्ण प्रकाशन है। इसका अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचार-प्रसार होना चाहिये। ग्वालियर की प्रतिमाओं की विशालता एवं भव्यता दर्शनीय है। शास्त्रीजी की पुस्तक ज्ञानपीठ का गौरव बढ़ाने वाली है। दिगम्बर सांस्कृतिक एव साहित्यिक संस्थाओं में कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ ने बहुत प्रगति की है और इसके प्रकाशन, इसके द्वारा संचालित शोध संस्थान, सन्दर्भ पुस्तकालय, ज्ञानपीठ पुरस्कार इन सबके द्वारा दिगम्बर जैन धर्म के विज्ञान की खोज को बड़ी सहायता मिली है। जैनाचार्यों ने जो उपकार किया है, उसका लाभ सभी प्राप्त कर सकें, इस दिशा में कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ अग्रसर है। मेरी शुभकामनाएँ स्वीकार करें। . डॉ. जयकिशनप्रसाद खण्डेलवाल निदेशक - वृन्दावन शोध संस्थान, आगरा अर्हत् वचन, वर्ष 10, अंक 4, अक्टूबर 1998 में प्रकाशित श्री राजकुमार नांदगांवकर के लेख 'पर्यावरण विज्ञान के जनक भगवान ऋषभदेव' में 'वनस्पति जगत की व्याख्या के अन्तर्गत कल्पवृक्षों को वनस्पति मानकर भी पृथ्वीकायिक लिखा है जो . परस्पर विरोधी है। अर्हत् वचन, वर्ष 9, अंक 2, अप्रैल 1997 में प्रकाशित मेरे लेख 'Kaipvrikshas, The Benovelent Trees' (Scientific Interpretation) में पृष्ठ 64 पर वास्तविकता के आधार पर. प्रमाणित किया है कि कल्पवृक्ष वस्तुत: वनस्पति ही थे। जैन दर्शन की वैज्ञानिकता की दृष्टि से इस पर विद्वानों का स्पष्ट अभिमत अभीप्सित है। . सूरजमल जैन से. नि. अधिकारी - राजस्थान वन सेवा 7- बी, तलबंडी, कोटा- 324005 अर्हत् वचन का अक्टूबर 98 अंक मिला। कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ तथा हस्तिनापुर शोध संस्था के बारे में जानकारी मिली। जैन कि के कई विषयों पर चिन्तन / शोध की आवश्यकता महसूस की जा रही है। अर्हत वचन के उपरोक्त अंक में ही तत्वार्थ सूत्र में जीव विज्ञान की अवधारणा में परस्परोपग्रहो जीवानाम तथा स्थावर जीवों पर विवेचन है। निष्कर्ष में अन्वेषण / अनुसंधान की आवश्यकता बताई गई है। भारतीय ज्ञानपीठ के आचार्य गोपीलाल 'अमर' ने खतौली से डा. कपूरचन्दजी जैन द्वारा द्वारा लिखित प्राकृत एवं जैन विद्या शोध सन्दर्भ में जैन विषयों का, जिन पर शोध की आवश्यकता है, अच्छा दिशा बोध दिया है। अब शोध को कैसे कार्य रूप में परिणित किया जाये? मेरे चिन्तन में आता है कि जैन विद्वानों और मनोविज्ञान (Psychology), वनस्पति विज्ञान तथा सूक्ष्म जीव विज्ञान (Microbiology) के विद्वानों के संयुक्त निर्देशन में जैन विद्या के शास्त्री को, जिन्होंने उपरोक्त विषयों में M.A./M.Sc. किया हो, उन विषयों पर शोध / चिन्तन के लिये उत्साहित किया जाये, उनके लिये 1-2-3 साल की छात्रवृत्ति दी जाये। गरा/ हमारे ट्रस्ट का इसमें नम्र सहयोग रहेगा। . पी. सी. जैन 8/1, लाल बाजार स्ट्रीट, रुम नं. 2 - ए. कलकत्ता- 100001 फोन : 230362 न, जनवरी 99
SR No.526541
Book TitleArhat Vachan 1999 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages112
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size8 MB
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