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________________ २०४: प्रशुद्धन त०.२३-४-33 हिन्दी विभाग. सिद्धांतिक वचन और साधुओं के आचार विचार के नियमोंका उलंघन न हो इसका भान रखने की आवश्यकता है. जिन सत्कर्मों के उपलक्ष में उपाधियां दी जाती है उन कर्मों का उपाधियों की व्याधि.. प्रायः ये उपाधियां स्वीकार करने से विक्रय सा हो जाता है, अ प सायन और इतने समय तक किये हुए आत्मोद्धार के प्रयत्न को. उत्थानके लिये प्रयत्न करने लगा है. सभी संप्रदाय मी स्वल्प में निम्फल कर दिये जाते हैं. वर्षों से किये हुए को अपनी ओर से कुछ न कुछ कर रहे हैं. ऐसे समय यदि का इस प्रकार अंत करना याने सब दिन चले और ढाई समाज को उस के दोषी से परिचित न किया जाये तो क्या कोस बाली उक्ति जैसा होता है. यदि दिक्षा ग्रहण, पंच. समाज का अर्थःपतन होकर वह नष्ट भ्रष्ट होने के पक्षात महाबत पालन, तप.संयमादिका, अंतिम ध्येय मोक्ष साधन किया जावे!. . . है तो यह उपाधि की व्याधि साधु मुनिराजों के मत्थे मह पूर्व कालिन इतिहास हमे बताता है कि समाज का कर उन्हें उनके ध्येयसे पतित करने में श्रावकोंको लाभ क्या? उत्थान, या पतन उस के गुरु या साधु वर्ग पर ही विशेषतः अच्छा हो यदि ये उपाधिदान की क्रिया भविष्य में सर्वथा निर्भर होता है. यदि साधु आचार या क्रिया नष्ट हो जाये त्याग दी जाये आत्मोद्धार के मार्ग में ऐसी कृतियां हमेशा तो गृहस्थ यां, समाज पर उनके उपदेशका प्रभाव नहीं गिर कटकरूप हुशा करती है. अतःसुशजनों के लिये कंटफ उठा सकता, किन्तु उसका दुष्परिणाम सारे समाज पर होता है. कर यदि मार्ग स्वच्छ कर लीया जावे तो आशा है कि जैन समाज निकट भविष्य में फिरसे अपने गौरव और उन्नतिको, दुर्भाग्यवश ऐसे चिन्ह जन साधुभाम इस समय दिलाइन पहुंच जावेगा. . . .. .. लगे हैं. काम, क्रोध, लोभ, मोहादिका उन पर परिणाम हो . यदि बैन समाजको अपना पुनरुत्थान करना है, रहा है. यही कारण है कि उन के संबंध में समाजको सदा- अपना गत गौरव प्राप्त करना है तो वर्तमान में साधुश्रावकों बनामें तृदि दिखाई देने लगी है. श्रद्धा में अविश्वास घर फर के आचार में जो शिथिलता आ गई है, धर्मके मूल सिद्धान्तो रहा है और जिन-जिन चांतों की वेवांश करते हैं सब का मर्म न समझ कर उसके विकृतार्थ से समाज निस्सत्व उन से दूर जाना चाहती हैं. इतना होते हुए भी सम्मान की चौर्य हीन निरुत्साही और सत्पथच्युत हो रहा है उस में लालसा इतनी बढ़ रही है कि किसी दिन उसकी सीमा न जैन समाज को सत्पथ गामी बनानेकी बहुत अवश्यकता है. तात्विक देश कालानुसार सिद्धांतो का शुद्ध परिवर्तन कर रहेगी. इस मानकें हस्ती पर संबार होने पर उनके चारीत्र आशा है कि हमारे परम पूज्य गुरुजन और समाजके सूज्ञ पालन में क्या क्या दोष छगते हैं इसका दिग्दर्शन करनेसे नेता अपनी संकीर्ण दृष्टि और सांप्रदायिक वृथाभिमान को न, करना ही ठीक. उपाधि की उपाधि भी दिन दूनी बढ़ रही त्याग कर भारतीय उत्थानकी धुडदौड में कदापि पीछे कोई व्याकरणानि रहेंगे. अस्तु. -ठाकुर लक्ष्मसिंहजी चौधरी पूज्य. कोई युवराज. इतना ही होकर रहता तो ठीक परंतु बामणवादजीमें केसरीयाजीके लिये किया हुवा ठराव. , इम पर्दथियोंकी पूछ अब हनुमानजी की पूंछ जैसी गंढती ही अपने श्री केसरीयाजी तीर्थ की व्यवस्था जिस प्रकार जा रही हैं. योग्यायोग्यता का प्रश्नही नहीं, उपाधि मात्र बहुत समयसे होती आ रही थी। उसके विरुद्ध पंडोने राज्यसे होना चाहिये और वह भी, लंबी लंबी, यहां तक कि तीन. एक तरफा हुक्म प्राप्त कर लिया है कि पूजन प्रक्षालन और तीन लकीरों में भी वे पूरी न हो सके.... . .. बौलियां का कुल रुपया पड़ों को ही मिला करे। यह हुक्म इस में उपाधि धारियों को भी अधिक दोष नहीं दिया बिलकुल अनुचित और जैन समाज की धार्मिक लागनी को जा सकता, साधुओंकी अनिच्छा होते हुए भी हम भक्तजन दुःखाने वाला है, अतः यह पदरह हज़ार जैनो की यह सभा उनके सिर ऐसी उपाधियां बलात्, जड़ देते हैं, और उन्हें श्रीमान् महाराजा साहिब उदयपुरसे प्रार्थना करती है कि विवश होकर के स्वीकार करनी होती है. श्रद्धावान शिष्यवृंद इस भनुचित हुक्म को शीघ्र ही रद करनेकी कृपा करें और अत्यावर और भक्तिवशता में तल्लीन हो ये उपाधियां गुरु- अब तक हमारा पैसा तीर्थ के भंडार में है जमा न होने लगे जनों की तपश्चर्या, समाज या धर्मकायके उपलक्ष में जबरदस्ती तब तक सब यात्रियों को चाहिए कि तीर्थ पर किसी प्रकार ही उनके गले लटका देते हैं. परंतु ऐसे अवसर पर जैन की बोली न बोले और वहां एक पैसा भी खर्च न करें।" . પત્ર મનસુખલાલ હીરાલાલ કાલને જૈન ક્રાદય પ્રિન્ટીંગ પ્રેસ, ધનજી ટ્રીટ, મુંબઈ નં. પ માં છાપ્યું છે, અને ગેક દાસ 1નાલ શાહે 'જન . સવ’ માટે ૨-૩ ૭, ધનજી ટ્રીટ, મુંબઈ 8, માંથી પ્રગટ કર્યું છે...
SR No.525797
Book TitlePrabuddha Jivan - Prabuddha Jain 1933 04 Year 02 Ank 23 to 26
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChandrakant V Sutaria
PublisherMumbai Jain Yuvak Sangh
Publication Year1933
Total Pages40
LanguageGujarati
ClassificationMagazine, India_Prabuddha Jivan, & India
File Size3 MB
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