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________________ १८६ પ્રબુદ્ધ જૈન, 'ता०८-४-33 हिन्दी विभाग.. सकते, यदि करें तो अधर्म और घोर पाप होता है, इस पाखंड को तोडकर चारों वर्षों की व्यवस्था गुण कर्म पर फिरसे निर्धारित कर त्राणीमात्र के लिये प्रभुवीर ने धर्मशासनके द्वार -श्री महावीर जयन्ती और जैनोंके कर्तव्य- खोल दिये. प्रभुवीर नेउ पदेश मात्र देकर के ही इति कर्तव्यता (ले. पं. विद्यालंकार यतिवर्य श्री हीराचंद्रजी महाराज, मु. काशी.) नहीं करी, किन्तु यथार्थ में उसका पालन में लीया. वर्णाश्रम की - मायावी जाल की तोडकर चतुर्विध जैन संघ रूप तीर्थ की चरम तीर्थकर शासन नायक प्रभु महावीरस्वामी का स्थापना कर गृहयो के लिये द्वादशत रूप श्रावक धर्म और पवित्र जन्म दिन फिन को नही आल्हादकारी होगा! जैन साधुओ को पंचमहामत रूप १७ तरह का संयम धर्म का संसार में इस प्रसंग पर आनंद उत्साह धार्मिक भावनाये उपदेश देकर आध्यात्मिक राष्ट्रिय, सामाजिक, नैतिक, शारिसर्वत्र सर्व नगर गामो में फलेगी, और संघटित होकर वीर रिक आदि सर्व दृष्टियो से मनुष्योका कल्याण किया, गृहस्थो जयन्ती उजवी जायगी, प्रभुवीर हीकि एक जयन्ती उत्सब है का सम्यकव्य मूल द्वादशव्रत का यथार्थ मनन करने से उपरोक्त जिस में सर्व जैन संप्रदाय प्रभुवीर ही को अपना प्राचीन विषय के ठीक समझमे आ सकता है, गुण कर्म, और सदाचार आदर्श समझते है, और उन्ही के प्रणीत आगम उपदेशो को पर ही इस तीर्थ का महत्त्व है, चतुर्विध जैन संघ रूप तीर्थ अद्धा के साथ धारण करते है. वीर जयन्ती ही जैनो के लिए की सत्संगती से अपनेक जीवो का कल्याण हुआ है. ४ गति • प्राचीन प्रसंग है जिस में सर्व जैन संप्रदायों की एक सरीखी ८४ लक्ष जीबायोनि के प्राणियों को यही तीर्थ आधार है. इस भक्ति और पूज्य भावपूर्वक संप्रदायिक भेद प्रभेदों को भूल परसे समझ सकते है कि प्रभुवीरने सो पुरुषो को सुसंय भी कर एक जगह एकत्रित होते है, जैन मात्र प्रभु वीर पर बना कर जगत का अनन्य उपकार किया है. इन्द्रभूति आदि अगन्य श्रद्धा भक्ति रखता है. क्यों न हो, प्रभु वीर का जन्म प्रखर विद्वान् ब्राह्मणोगे, श्रेणिक कौणिक चेडा, उदायन आदि ही ऐसा है कि त्रिलोक के जीवों को शान्ति प्राप्त होती है, क्षत्रिय राजा महाराजाओने, जंबु, धन्ना, शालिभद्र, आदि वैश्य जिस परम कारुण्य निधि भगवान् महावीर ने त्रिलोक के महाजनोने, मैतार्य चित्र, संभूति, हरिकेशी, दृढप्रहारी ऐसे बन्दनीय पूजनीय सर्यदशी हो करके भी विवहित के लिये अस्पृश्यों को और आर्दककुमर सरिखे यवनोको इसी पवित्र अन्तिम निर्वाण के समयमे भी १६ प्रहर की देशना दी, जैन संस्कृतिक छत्र तल नीचे आने पर पवित्र भागवती जडवाद में लुब्ध अज्ञानी जीवों को आत्मानुभव, आत्मस्वातंत्र दीक्षा के अधिकारी होकर जगत पर महान् धर्माचार्य का का अनुभव कराया, चार गति ८४ लक्ष जीवायोनिरूप भवचक काम करके कितनेही सिद्ध बुद हो गये कितनेक भवान्तरो में से अनेक आत्माओं को मुक्तिपद प्राप्त कराया, अनंत जन्म सिदबुद्ध हो गये देवताओको भी वंदनीय पूजनीय और जरा मरण आधि व्याधि उपाधि दुःखों से पीडित आत्माओं स्तयनीय हो गये. मनुष्यों को पूजनीय हो इस में आर्य को सदुपदेश द्वारा संयमी सदाचारी तपस्वी त्यागी बना कर ही क्या है ! यह सर्व विषय उत्तराध्ययन सूत्र में स्पष्ट चर्चा सदा के लिये अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख, अनंत गया है. इस पर से वीर शासन का ध्येय क्या है यह प्रत्येक पराक्रमरूप आत्मशुद्धि के भोक्ता बन दिये विश्वप्रेममय अहिंसा, को स्पष्ट समझ में आ सकता है. तीर्थकर नाम कर्म भी सत्य और सदाचार का उपदेश देकर सम्राट, चक्रवर्ती, राजा “सब जीव करु शासनरसी ऐसी भावदया मन उल्लसी" महाराजा, शेठ, साहुकार से लेकर यावत् गरीब से गरीब इस तरह की आदर्श विशाल भावदया के कारण ही से प्राणियों का समभाव से कल्याण किया, गुण कर्म पर स्थापित बंधता है, तीर्थकर नाम कर्म उदय आने पर समवसरण में चारो वर्ण व्यवस्था को कुगुरुओने स्वार्थ सिद्ध के लिये अपने १२ परखदाओं के द्वार सभी वर्गों के मनुष्य देव तीर्थचो, प्रभुत्व को टिफाय रखने की लालसा के वशीभूत होकर जन्मतः तक के लिये खुले रहते है, समभाव से विश्व कल्याण का ज्ञातिवाद को स्थापित कर जप, तप, आदि धर्मानुष्ठान के उपदेश तीर्थकर देव करते है. इसी से "जैन धर्म" विश्व धर्म अधिकारी ब्राह्मण ही हो सकता शावादिक का पठन पाठनादि हो, सकता है जैन शासन के इस आदर्श को आज जैन संघ कार्य ब्राह्मण ही कर सकते अन्य इस के अधिकारी नही हो कहां तक भूल गया है यही इस प्रसंग पर लक्ष्य में लेनेका है. ખા પુત્ર મનસુખોઇજ કી લાજ લા અને જૈન શાયરીદય પ્રિન્ટીંગ પ્રેસ, ધન સ્ટ્રીટ, મુમ્બઇ નં. ૩ માં 'છાયુ છે, ખૂને ગાફલદાસ મગનભાલ ચાહે "જૈન યુવક સંધ’ માટે ૨૬-૩૦, ધનજી સ્ટ્રીટ, મુંબઈ ૩, માંથી પ્રગટ કર્યું છે,
SR No.525797
Book TitlePrabuddha Jivan - Prabuddha Jain 1933 04 Year 02 Ank 23 to 26
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChandrakant V Sutaria
PublisherMumbai Jain Yuvak Sangh
Publication Year1933
Total Pages40
LanguageGujarati
ClassificationMagazine, India_Prabuddha Jivan, & India
File Size3 MB
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