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संपादकीय श्रुतसागरनो ३७मो अंक आपश्रीना हाथमां छे.
एक सुभाषितकार कहे छे :- मनुष्य ए पशु जेवो छे, जो ज्ञान न होय तो. सुभाषितकारनी वात पण साची जणाय छे. पाणी अने श्वासनी जेम जीवन माटे ज्ञान पण आवश्यक छे. अने एटले ज आपणा शास्त्रकारोए लख्युं छे के हे प्रभु जो आपना जिनागम न होत तो अनाथ एवा अमे क्यां जात? ज्ञाननी महत्ता दरेक धर्ममां अने दरेक देश काळे एनी समान रूपे आवश्यकता रही छे. अने एटले ज दरेक धर्म अने दरेक परंपराए अलग अलग आयामो अने एना विविध स्वरूपोथी ज्ञाननो स्वीकार को छे.
___ षड्दर्शनना पायाना सिद्धांतोमां ज्ञानतत्त्व अने आत्मतत्त्व बहु पायानुं अने महत्त्व- स्थान धरावे छे. अने एना आधारे ज ते ते दर्शनना सिद्धांतो अने तत्त्वोनी रचना करवामां आवी छे. आ अंकमां ए ज हेतुसर आपणे त्यां पूर्ण ज्ञानी पुरुषोए प्ररूपेली ज्ञान संबंधी केटलीक विगतो रजु करी छे. जेथी सामान्य वाचको जैनदर्शनमां प्ररूपायेला ज्ञानना विविध प्रकारो अने स्वरूपोने जाणी शके. आ अंकनी वात :
प. पू. आचार्य भगवंतश्री पद्मसागरसूरीश्वरजी म. सा. ना प्रवचनोमांथी चूंटेला पाप अने सत्य विषयक केटलांक चोंटदार सुवाक्योने गुरुवाणी हेठळ प्रकाशित कर्या छे. विक्रमनी १९मी सदीमां थयेला अमीविजयजी म. सा. ना शिष्य विनोदविजयकृत शिवपुरीतीर्थ चैत्यपरिपाटीनी कृति आ अंकमां प्रकाशित करी छे. तो साथे साथे विक्रमनी सत्तरमी सदीमां थयेला वाचक सोममूर्ति कृत उत्तराध्ययनसूत्रनी सज्झाय आ अंकमां प्रकाशित करी छे. आ कृतिनुं संपादन डॉ. रतनबेन छाडवा द्वारा थयेल छे. कृतिपरिचयमां कृतिनो भावानुवाद अने उत्तराध्ययनसूत्रनी केटलीक प्राथमिक जाणकारीओ नोंधेली छे.
डॉ. भानुबेन सत्रा द्वारा जैनदर्शनमां पांच ज्ञानना स्वरूपनी प्राथमिक पण सुंदर रीते प्रस्तुति करेली छे. पांच ज्ञानना स्वरूपनी विभावना अने ए ज्ञाननी विशेषताने लेखमां स्थान अपायेलुं छे. जे वाचको माटे रसप्रद बने एवं छे. दर वखतनी जेम आ अंके पण जैन सत्यप्रकाशमांथी पू. मुनिश्री विद्याविजयजी म. सा. द्वारा लखायेलो कच्छना प्रसिद्ध तीर्थक्षेत्र श्री भद्रेश्वरतीर्थनो परिचय आ लेखमां प्रकाशित कर्यो छे. तीर्थना सामान्य परिचयनी साथे भद्रावतीतीर्थनी ऐतिहासिक विगतो पण आ लेखनी महत्ताने वधारे छे. महिमासभर अने पवित्रता बक्षे एवा
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