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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ४ श्रुत सागर, भाद्रपद २०५९ दादा गुरुदेव गच्छाधिपति आचार्य श्री कैलाससागरसूरि महाराज की प्रेरणा और आशीर्वाद तो मानो पुरूषार्थ और सिद्धि की तरह साथ ही थे. गच्छाधिपति आचार्यदेव की सत्प्रेरणा से कोबा चौराहे के आसपास की मौके की जमीन इस पुण्य कार्य हेतु स्वर्गस्थ शेठ रसिकलाल अचरतलाल शाह द्वारा सादर प्रस्तुत की गई. दादागुरुदेवश्री चाहते थे कि एक ऐसा उत्तम स्थान बने जहाँ पर साधु भगवन्तों के अध्ययन की समुचित व्यवस्था हो. शास्त्र अध्ययन हेतु कोई भी सामग्री एक ही जगह से प्राप्त हो और साथ-साथ चारित्र व दर्शन की परिशुद्धि का पवित्र संगम हो. महापुरुषों की इच्छा ही कुदरत की इच्छा बन जाती है. ज्ञानभंडार के निर्माण हेतु शेठ श्री तेजराजजी जुगराजजी सालेचा का आर्थिक सहयोग भी प्राप्त हुआ. सन् १९८० के २६. दिसम्बर के शुभ दिन श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र, कोबा तीर्थ की विधिवत स्थापना हुई. कलिकाल में मोक्षमार्ग के दो आधार स्तंभ है. प्रथम विश्व को आध्यात्मिक प्रकाश देनेवाले जिनबिम्ब और द्वितीय श्रुतज्ञान की सम्यग् उपासना. इन दोनों का समन्वय है- श्रीमहावीर जैन आराधना केन्द्र कोबा. जिनशासन की प्रतिनिधि संस्थाओं में यह केन्द्र अग्रस्थान प्राप्त कर चुका है. यहाँ धर्म एवं आराधना की एकाध नहीं अनेकविध प्रवृत्तियों का महासंगम हुआ है. जैन आराधना यह तीर्थभूमि कला स्थापत्ययुक्त भव्य जिनालय, आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर, भवन ( उपाश्रय), आचार्य श्री कैलाससागरसूरि स्मारक मन्दिर (गुरुमन्दिर), मुमुक्षु कुटीर आदि विविध विभागों के साथ विशाल पैमाने पर विकसित होकर जिनशासन की प्रभावना करने में समर्थ सिद्ध हुई है. आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर का प्रारम्भ दादा गुरुदेव गच्छाधिपति आचार्य श्री कैलाससागरसूरि महाराज को समर्पित इस प्रकल्प का प्रारम्भ वैशाख सुदि ६, वि.सं. २०४९ को हुआ था. पूज्य आचार्यश्री ने यहाँ चल रहे ज्ञानयज्ञ के लिए अभी तक लगभग ८०,००० कि.मी. से भी अधिक पैदल विहार के दौरान जैन बस्ती से खाली हो चुके गाँवों में जाकर उपाश्रय आदि में बरसों से बंद पड़े कबाटों को जब बड़ी मुश्किली से खुलवाया तो अनेक जगहों पर बड़े आघातजनक अनुभव हुए. पूरे के पूरे ग्रंथ भरे कबाट दीमक भक्षित मिट्टी के ढेर के रूप में पाए गए तो कई जगहों पर बरसाती पानी कबाटों में प्रविष्ट हो जाने की वजह से भीग जाने के कारण ग्रंथ चिपक कर गट्टे की तरह हो गए एवं बुरी तरह फफूँद ग्रस्त व कीटक भक्षित पाए गए. कई बार लोहे के पीप आदि में हँस कर जैसे-तैसे भर दी गई धूल से सनी विशीर्ण हालत में प्रतें प्राप्त हुई हैं. कुछ स्थानों पर तो संघ वालों को पता तक नहीं था कि उनके पास विरासत रूप ग्रंथ भी है. ये टांड (मचान, माळिए) पर चमगादडों के बीच बरसों से पड़े थे और वहाँ से मिले. कई जगहों पर सुरक्षित अवस्था में भी भंडार मिले. इन चिपके ग्रंथों के पत्रों को अलग करना स्वयं में एक दुरूह कार्य फफूँद व कीटकग्रस्त जीर्ण हो चुकी प्रतों को साफ कर पुनः मजबूत करना भी अत्यंत श्रमसाध्य कार्य है. इन्हें ठीक करते समय उड़नेवाले विषाक्त कणों से आँखें लाल हो जाती थी एवं नाक पर कपड़ा बाँधकर रखने पर भी जुकाम हो जाता था. इस कार्य की एक ही बैठक के बाद कपड़े पहन कर रखने योग्य नहीं रहते थे. नीचे गिरा कचरा भी इतना होता था कि एक बार में तो साफ भी नहीं होता था. रद्दी जैसे उन ढेरों में से भी कई बार बड़े ही काम के ग्रंथ मिले हैं. आज भी इस तरह से काम चलता ही रहता हैं. ग्रंथों की दुर्दशा की वजह है- भारत के लिए प्रतिकूल एवं कुदरती सिद्धान्तों से विरूद्ध ऐसी थोपी हुई For Private and Personal Use Only
SR No.525261
Book TitleShrutsagar Ank 2003 09 011
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoj Jain, Balaji Ganorkar
PublisherShree Mahavir Jain Aradhana Kendra Koba
Publication Year2003
Total Pages44
LanguageGujarati
ClassificationMagazine, India_Shrutsagar, & India
File Size1 MB
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