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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir १२ श्रुत सागर, भाद्रपद २०५९ सुगमता से अधिक मात्रा में प्रतों को उठा कर साथ रखा जा सके इसी एकमात्र परोपकार की भावना से. श्रमण व श्रावकगण विशाल संख्या में भक्तिभाव से श्रेष्ठ कोटी के ग्रंथों का लेखन किया करते थे. श्रावकवर्ग लहियाओं के पास भी ग्रंथों को लिखवाते थे. कायस्थ, ब्राह्मण, नागर, महात्मा, भोजक इत्यादि जाति के लोगों ने लहिया के रूप में प्रतों को लिखने का कार्य किया है. प्रत लिखने वाले को लहिया कहा जाता है. इन्हें प्रत में अक्षरों को गिन कर पारिश्रमिक दिया जाता था. लेखन सामग्री - पत्र, कंबिका, गांठ (ग्रंथि), लिप्यासन (ताडपत्र, कागज आदि लिपि के आसन) सांकळ, स्याही, लेखनी, ओलिया (फांटिया) इत्यादि हुआ करती थी. ग्रंथ शोधन सामग्री - पीछी तूलिका, हरताल, सफेदा, घूटा, गेरु इत्यादि प्रयुक्त थी. जैन प्रतों को लिखने में व उसकी सज्जा पर इतना ध्यान दिया जाता था कि एकबार देखने मात्र से ही पता चल जाता है कि यह जैन प्रत है या अन्य पूर्व महर्षियों ने लेखन पर जितना ध्यान दिया उतना ही ध्यान ग्रंथों के संरक्षण पर भी दिया. ग्रंथों को लाल मोटे कपड़े या रेशमी कपड़े में बड़ी मजबूती से बाँधकर लकड़ी या कागज की बनी मंजूषाओं में सुरक्षित रखा जाता था व श्रुत को ही समर्पित ज्ञानपंचमी जैसे पर्वों पर इनका प्रतिलेखन किया जाता था. शिथिल ढीला बंधन यह एक अपराध सा समझा जाता था. प्रतों के अंत में प्रतिलेखन संबंधी मिलने वाले विविध श्लोकों में एक अति प्रचलित श्लोक में खास हिदायत दी गई है कि "रक्षेत् शिथिल बंधनात् " इसी तरह जल, तैल, अग्नि, मूषक, चोर, मूर्ख व पर- हस्त से प्रत की रक्षा करने की हिदायतें भी मिलती है. साथ ही इन श्लोकों-पद्यों में प्रतिलेखक स्वयं के हाथों बडे परिश्रम से लिखी गई प्रत के प्रति अपनी भावनाओं को प्रकट करते थे. कहते हैं कि मुद्रण युग के आ जाने से ग्रंथ पढ़नेवालों को बड़ी सुविधाएँ हुई हैं इसमें उपलब्धता, श्रेष्ठ संपादन आदि पहलुओं से एक देश तथ्य भी है परंतु वाचक हेतु अत्यंत उपकारी ऐसी विभक्ति-वचन संकेत जैसी उपरोक्त सुविधाओं से युक्त एक भी प्रकाशन अद्यावधि देखने में नहीं आया है. मुद्रण कला ने ग्रंथों की सुलभता अवश्य कर दी है परंतु कहीं न कहीं यह भुला दिया जा रहा है कि सुलभता का मतलब सुगमता ग्रंथगत महापुरुषों के कथन के एकांत कल्याणकारी यथार्थ हार्द तक पहुँचना नहीं हो जाता. सुगमता तो मार्गस्थमति व समर्पण से प्राप्त गुरूकृपा का ही परिणाम हो सकती हैं. अपरिपक्वों को शास्त्रों की निरपेक्ष सुलभता स्वच्छंदता जनित स्व-पर हेतु अपायों की अनिच्छनीय परंपरा खड़ी कर सकती हैं, करती हैं यह सभी महर्षियों की अनुभवसिद्ध एकमत अभिघोषणा है. आत्मार्थियों को इस हेतु जागृति रखनी आवश्यक है. 8 88 For Private and Personal Use Only - हस्तप्रत प्रतिलेखन पुष्पिका : एक परिचय परिचय : हस्तप्रत के विषय में लघुतम से महत्तम सूचनाएँ प्रतिलेखन पुष्पिका से ज्ञात होती हैं. हस्तप्रत के संबंध में लेखन संवत, लेखन स्थल व अन्य आनुषंगिक माहिती- लहिया / पाठक, लिखवानेवाले / उपदेशक आदि के व्यक्तित्व - कृतित्व के विषय में, उनकी गुरु परम्परा व उनके द्वारा किए गए प्रतिष्ठा, अन्य ग्रंथलेखापन, ग्रंथसर्जन, आदि कार्यों के विषय में, विद्वान के गच्छ की उत्पत्ति आदि के विषय में, (स्वयं के शिष्य, गुरुभाई, अन्य कोई विशिष्ट मंत्री आदि) किसके लिए या किसकी प्रेरणा से प्रत लिखी गई है, यदि प्रेरक गृहस्थ हो तो क्वचित उसकी वंश परम्परा, प्रति को शास्त्र मर्यादा आदि की दृष्टि से उसे संशोधन " करनेवाले अन्य आचार्य आदि का नाम व उनके द्वारा किए गए धर्म कार्य, लेखन में सहयोगी अपने शिष्य, गुरुभाई आदि अन्य विद्वान का नाम, वर्तमान गच्छ नायक का नाम शासक राजा, उसकी वंशावली व
SR No.525261
Book TitleShrutsagar Ank 2003 09 011
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoj Jain, Balaji Ganorkar
PublisherShree Mahavir Jain Aradhana Kendra Koba
Publication Year2003
Total Pages44
LanguageGujarati
ClassificationMagazine, India_Shrutsagar, & India
File Size1 MB
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