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________________ एतास्थाः को भा भविष्यति मनो-वल्लभ इति कथय । सुमतिः निरूप्य निमित्तमेवं समुल्लपति ।।१४१॥ युग्गग अर्थ :- त्यारे प्रसन्न मुद्रावाळा नरवाहन राजा आ प्रमाणे कहे छे, “हे सुमति आ मारी बहेन कमलावती कन्या छे। तेणीनो मन वल्लभ भरथार कोण थशे ते तुं मने कहे" सुमति ए निमित्त बराबर जोड़ने आ प्रमाणे कहो। हिन्दी अनुवाद :- तब प्रसन्न मुद्रावाले नरवाहन राजा ने इस प्रकार कहा - "यह मेरी बहन कमलावती कन्या है, इनका मन-वल्लभ पति कौन होगा वह तुम मुझे कहो, सुमति ने निमित्त को अच्छी तरह से देखकर कहा - गाहा : नर-वर ! चित्ते लिहियं एईए रूवयं पुलोएत्ता । मुच्छिज्जिस्सइ जो इह होही भत्ता इमीए सो ॥१४२।। छाया : नर-वर ! चित्रे लिखितं एतस्या रूपकं प्रलोक्य । मूर्छिष्यति य इह भविष्यति भर्ता अस्याः सः ॥१४॥ अर्थ :- “हे नरश्रेष्ठ ! चित्रमा दोरेलु एणीनुं रूप जोइने जे मूर्छित थशे ते कमलावती नो भरथार थशे ! हिन्दी अनुवाद :- 'हे नरश्रेष्ठ ! चित्र में इनका रूप देखकर जो मूर्च्छित होगा, वही इनका पति होगा। गाहा: सयलोरोह-पहाणा तस्स य होही इमा महादेवी । एत्थत्थे य नरेसर! मा काहिसि अन्नहाभावं ॥१४३।। छाया: सकलावरोध-प्रधाना तस्य च भविष्यतीयं महादेवी । अत्रार्थे च नरेश्वर ! मा कार्षीरन्यथाभावम् ॥१४॥ अर्थ :- ते राजानां सम्पूर्ण अंतपूरमां मुख्य-रूपे पट्टराणी थशे, आ विषयमा हे! नरेश्वर तमे कोई पण शंका करशो नही।" हिन्दी अनुवाद :- वह राजा के अंतपुर में प्रधान-पटरानी होगी, इस विषय में हे नरेश्वर ! आप तनिक भी चिन्ता न करें।" गाहा :- सागर श्रेष्ठी द्वारा पोताना भावि जमाईनी चिंता एत्थंतरम्मि सागर-सेट्ठी संलवइ सुमइ-नेमित्तिं । सिरिकंताए भत्ता को होही मज्झ धूयाए ? ॥१४४।। छाया: अत्रान्तरे सागर श्रेष्ठी संलपति सुमति-नैमित्तम् । श्रीकान्ताया भर्ता को भविष्यति मम दुहितुः ॥१४४।। 42 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.525052
Book TitleSramana 2004 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivprasad
PublisherParshvanath Vidhyashram Varanasi
Publication Year2004
Total Pages298
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Sramana, & India
File Size13 MB
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