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मुनि श्री क्षमासागर जी
की कविताएँ
- मुनि श्री क्षमासागर जी
लोग
और शायद कभी कहीं
हम यहाँ कोई घटना होती है
दो-चार कदम चले तो लोगों को
और ठहर गये बहुत कुछ
सोचने लगे कहने-सुनने की
कि जब सब गुंजाइश मिलती है
आपोआप हम लोग तो
समय आने पर होगा चाहते ही यही हैं
तब हमें कि जरा परदा हटे
क्यों व्यर्थ चलना है और हम सब देख लें
और यदि चले भी कि जरा कोई छिद्र हो
तो पहुँचेंगेऔर हम झाँक लें
इसका क्या भरोसा है घटना क्या हुई
चलो यहीं ठहर जाते हैं इससे हमें
आखिर कोई सरोकार नहीं
कहीं-न-कहीं पहुँच कर हम जो चाहेंगे
ठहरना ही तो है वही देखेंगे
तब से हम (जो हुआ वह नहीं देखेंगे) यहीं ठहरे हैं भीड़ में
और शायद कोई हमें
मन-ही-मन सजग / संवेदनशील कहे
हँसते भी हैं हम इतना ही चाहेंगे।
कि चलनेवाले
कितने नासमझ हैं! 'पगडंडी सूरज तक' से साभार
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