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________________ निश्चय रत्नत्रय है और निश्चय रत्नत्रय का साक्षात् कारण परम्परा से प्राप्त व्यवहार रत्नत्रय की प्रकर्षता है। इस संबंध में हम आचार्य अमृतचन्द्र की समयसार की टीका के कुछ उद्धरण देते हैं 'अस्यात्मनोऽनादिमिथ्यादर्शनज्ञानचारित्रैः स्वरूपप्रच्यवनात् संसरत: सुनिश्चलपरिगृहीतव्यवहार सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रपाकप्रकर्षपरम्परया क्रमेण स्वरूपमारोप्यमाण स्यान्तर्मग्ननिश्चयसम्यग्दर्शनज्ञान- चारित्रविशेषतया साधकरूपेण तथा परमप्रकर्षमकरिकाधिरूढरत्नत्रयातिशय प्रवृत्तसकलकर्मक्षयप्रज्वलितास्खलितविमलस्वभाव - भावतया सिद्धरूपेण च स्वयं परिणममानः ज्ञानं मात्रमेकमेवोपायोपेयभावं साधयति' (स्याद्वादाधिकार/पृ.५३१) अर्थ- यह आत्मा अनादि काल से मिथ्यादर्शन मिथ्याज्ञान एवं मिथ्याचारित्र से अपने स्वरूप से च्युत हो रहा है, किन्तु जब व्यवहार सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र को यह भली भाँति ग्रहण करता है तब उस व्यवहार रत्नत्रय की प्रकर्ष परम्परा के क्रम से यह स्वरूप में अन्तर्मग्न होकर निश्चय सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र को ग्रहण करता है और उस निश्चय रत्नत्रय की विशेषता से साधकरूप होकर उसी रत्नत्रय की परमप्रकर्षता की पराकाष्ठा को प्राप्तकर उसके अतिशय से सकल कर्मों का क्षयकर अस्खलित विमल स्वभाव से सिद्ध अवस्था में स्वयं परिणत होकर ज्ञान मात्र स्वरूप उपाय - उपेय-भाव को साधता है। इस कथन से दो बातें निश्चित होती हैं- एक तो यह कि व्यवहार रत्नत्रय पहले होता है और उसके पाकप्रकर्ष की परम्परा से जब स्वरूप में अन्तर्मग्न होता है, तब निश्चय रत्नत्रय होता है, दूसरी यह कि व्यवहार रत्नत्रय मूल कारण है और निश्चय रत्नत्रय की परम प्रकर्षता की पराकाष्ठा साक्षात् कारण है। अवलम्बन लेना पड़ता है और निश्चय रत्नत्रय में आत्मा के दर्शन ज्ञान चारित्र के लिए आत्मा का ही अवलम्बन रह जाता है। सालम्बन ध्यान और निरालम्बन ध्यान की जो स्थिति है अथवा सवीचार और अवीचार ध्यान की जो स्थिति है, वही स्थिति कारण कार्य के प्रश्न में व्यवहार रत्नत्रय और निश्चय रत्नत्रय की है। शीर्षासन प्रारंभ करनेवाला व्यक्ति पहले दीवाल का सहारा लेकर शीर्षासन करता है । बाद में बिना सहारे के शीर्षासन करता है। इसका अर्थ यह नहीं कि सहारा लेकर शीर्षासन का अभ्यास बिना सहारे के अभ्यास में कारण नहीं है। Jain Education International आचार्य अमृतचन्द्र ने 'तत्त्वार्थसार' में व्यवहार और निश्चय मोक्षमार्ग का जो कथन किया है, उसके कथन के दो श्लोक हैं श्रद्धानाधिगमोपेक्षाः शुद्धस्य स्वात्मनो हि याः । सम्यक्त्वज्ञानवृत्तात्मा मोक्षमार्गः स निश्चयः ॥ श्रद्धानाधिगमोपेक्षा या पुनः स्यु परात्मनाम् । सम्यक्त्वज्ञानवृत्तात्मा स मार्गो व्यवहारतः ॥ इन दो श्लोकों में पहले का अर्थ किया गया हैशुद्धात्मा का श्रद्धान, ज्ञान और उपेक्षा निश्चय मोक्षमार्ग है। और दूसरे का अर्थ किया है- परात्मा का श्रद्धान ज्ञान उपेक्षा व्यवहार मोक्षमार्ग है। ज्ञान, यहाँ प्रष्टव्य यह है कि यदि शुद्धात्मा का श्रद्धान, उपेक्षा निश्चय मोक्षमार्ग है, तो व्यवहार मोक्षमार्ग में क्या अशुद्ध आत्मा का श्रद्धान ज्ञान उपेक्षा होती है? आगे के श्लोक में जो परात्मा का श्रद्धान, ज्ञान, उपेक्षा होना बतलाया है, वहाँ परात्मा से क्या मतलब है? क्या स्वात्मा को छोड़कर या कोई दूसरा अभिप्राय है? वस्तुतः दोनों श्लोकों में सभी पद एक जैसे हैं । अन्तर केवल दो पदों में है। पहले श्लोक में 'स्वात्मनः ' पद है, जो षष्ठी विभक्त्यन्त है और दूसरे श्लोक में 'परात्मना' पद है, जो तृतीया विभक्ति का है, जिसका अर्थ होता है 'परात्मा के द्वारा ' । लेकिन लेखक ने इसका षष्ठीपरक अर्थ 'परात्मा का' किया है जो गलत है । और यह गलती 'स्वात्मनः ' पद के साथ संगति बैठाने के कारण हुई है। वास्तव में तो दोनों ही जगह 'स्वात्मना' और 'परात्मना' पद होना चाहिये। अतः दोनों श्लोकों का संगत अर्थ इसप्रकार करना चाहिए । यहाँ मूल कारण व्यवहार रत्नत्रय अपने कार्य निश्चय रत्नत्रयरूप परिणत हुआ है और निश्चय रत्नत्रय - रूप साक्षात् कारण अपने कार्य मोक्षरूप में परिणत हुआ है। यह कहना नितान्त गलत है कि व्यवहार कभी निश्चयरूप से परिणत नहीं होता। हमारा कहना है कि व्यवहार रत्नत्रय ही निश्चय रत्नत्रयरूप परिणत होता है। यह दलील भी अनुचित है कि व्यवहार का विषय 'पर' है और निश्चय का विषय 'स्व' है इसलिये व्यवहार निश्चयरूप परिणत नहीं होता । वास्तव में दोनों ही रत्नत्रय का विषय एक आत्मा अपने ही अवलम्बन से शुद्ध स्वरूप ज्ञान और उपेक्षा है । अन्तर इतना है कि व्यवहार रत्नत्रय में आत्मा के दर्शन भाव निश्चय रत्नत्रयरूप मोक्षमार्ग है तथा पर के अवलम्बन ज्ञान चारित्र के लिये अन्य देव शास्त्र गुरु आदि का । से शुद्ध स्वरूप का श्रद्धान ज्ञान और उपेक्षा भाव व्यवहार अप्रैल 2007 जिनभाषित 7 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524316
Book TitleJinabhashita 2007 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2007
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size5 MB
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