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________________ जिज्ञासा - समाधान पं. रतनलाल बैनाड़ा प्रश्नकर्ता : पं. बसन्तकुमार जी शास्त्री, शिवाड़ | लेकिन गोम्मटसार जीवकाण्ड गाथा, १२ की टीका (राज.) में यह भी कहा गया है कि अनन्तानुबंधी चतुष्टय में से किसी एक के उदय होने की अपेक्षा ली जाये, तो सासादन जिज्ञासा : सासादन गुणस्थान को पारिणामिक भाव गुणस्थान औदयिक भाव भी होता है। (परन्तु पहले चार किस प्रकार बताया है ? गुणस्थानों में चारित्रमोहनीय की अपेक्षा न होने से दूसरा समाधान : जीवकाण्ड गाथा ११ में इस प्रकार कहा गुणस्थान पारिणामिक भाव ही माना जाता है) गया है : जिज्ञासा : मारणान्तिक समुद्घात क्या है और वह मिच्छे खलु ओदइओ विदिए पुण पारिणामिओ भावो। किस जीव को होता है? मिस्से खओवसमिओ अविरदसम्मम्मि तिण्णेव॥११॥ अर्थ : मिथ्यात्व गुणस्थान में नियम से औदयिक भाव होता समाधान : आयु समाप्ति के अन्तिम अन्तर्मुहूर्त में, है, पुनः द्वितीय सासादन गुणस्थान में पारिणामिक भाव, मिश्र मूल शरीर को न छोड़कर, जहाँ अगला जन्म धारण करना गुणस्थान में क्षायोपशमिक भाव और अविरत सम्यग्दृष्टि हो, उस स्थान को स्पर्श करने के लिए आत्मप्रदेशों का बाहर गुणस्थान में औपशमिक,क्षायिक और क्षायोपशमिक ये तीनों निकलना मारणान्तिक समुद्घात है। भाव संभव हैं। यह समुद्घात सभी जीवों के नहीं होता। जीवकाण्ड यहाँ पर सासादन को पारिणामिक भाव कहने में गाथा ५४४ की टीका के अनुसार प्रतिसमय मरण को प्राप्त होने वाले अधिकांश जीवों को मारणान्तिक समुद्घात नहीं मुख्यता इस बात की है कि आदि के चार गुणस्थान संबंधी भावों की प्ररूपणा में दर्शनमोहनीय कर्म के अतिरिक्त शेष होता है। यह समुद्घात ऋजुगति तथा मोड़े वाली गति दोनों कर्मों की विवक्षा का अभाव है। यह सासादन गुणस्थान प्रकार की गति वाले संसारी जीवों के मात्र विग्रहगति में होता है। तीसरे गुणस्थान को छोड़कर (क्योंकि इस गुणस्थान में दर्शनमोहनीय कर्म के उदय-उपशम-क्षय अथवा क्षयोपशम से नहीं होता है। अर्थात् सासादन गुणस्थान होने में दर्शनमोहनीय मरण नहीं होता है) प्रथम गुणस्थान से ११वें गुणस्थान तक कर्म किसी रूप में भी कारण नहीं है। इसलिए इसको सभी गुणस्थान और सभी गति वाले जीवों के इसका होना पारिणामिक भाव कहा गया है। संभव है। इस समुद्घात में जीव के आत्मप्रदेश, अपने मूल शरीर को न छोड़ते हुए, अगला जन्म जहाँ लेना हो, उस श्री धवला पुस्तक - ७, पृष्ठ - १०९ पर यह प्रश्न स्थान तक जाते हैं और स्पर्श करके लौट आते हैं। ऐसी उठाया गया है कि अनन्तानुबंधी कषायों के उदय से सासादन | प्रक्रिया अगले भव की आयु के सत्ता में रहने के कारण गुणस्थान पाया जाता है। अत: उसे औदयिक भाव क्यों नहीं | नहा | संभव होती है। इतना विशेष है कि कथंचित् आत्मप्रदेशों के कहते? उत्तर : नहीं कहते। क्योंकि दर्शनमोहनीय के उदय, | लौटकर आने से पूर्व भी मरण संभव है। उपशम व क्षय व क्षयोपशम के बिना उत्पन्न होने से सासादन जिज्ञासा : मनुष्यनी के कितने गुणस्थान संभव हैं? गुणस्थान का कारण चारित्रमोहनीय कर्म ही हो सकता है। और चारित्रमोहनीय के दर्शनमोहनीय मानने में विरोध आता समाधान : आगम में गति मार्गणा का वर्णन करते है। पुनः प्रश्न : अनन्तानुबंधी तो दर्शन और चारित्र दोनों में | हुए मनुष्यों के संबंध में तीन शब्दों का प्रयोग देखा जाता है : मोह उत्पन्न करने वाला है? उत्तर : भले ही वह मोहनीय | १. मनुष्य : यह मनुष्य सामान्य के लिए अथवा हो, किन्तु यहाँ वैसी विवक्षा नहीं है। अनन्तानुबंधी | भावपुरुष वेदी, भाव नपुंसकवेदी, के लिए प्रयोग किया गया चारित्रमोहनीय ही है, इसी विवक्षा से सासादन गुणस्थान को | है। पारिणामिक भाव कहा है। 26 नवम्बर 2005 जिनभाषित Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524302
Book TitleJinabhashita 2005 11
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2005
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size4 MB
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