SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 9
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गतांक से आगे मुनि, आर्यिका और श्रावक के आचारमार्ग 4. कृतिकर्म : देवपूजा हमने मुनिधर्म और गृहस्थधर्म का सामान्य रूप से दिग्दर्शन कराते समय जिस प्रमुख धर्म का जान-बूझकर उल्लेख नहीं किया है, वह है कृतिकर्म । कृतिकर्म साधु और गृहस्थ दोनों के आवश्यक कार्यों में मुख्य है। यद्यपि साधु सांसारिक प्रयोजनों से मुक्त हो जाता है, फिर भी उसका चित्त भूलकर भी लौकिक समृद्धि, यश और अपनी पूजा आदि की ओर आकृष्ट न हो और गमनागमन, आहारग्रहण आदि प्रवृत्ति करते समय लगे हुए दोषों का परिमार्जन होता रहे, इसलिए साधु कृतिकर्म को स्वीकार करता है। गृहस्थ की जीवनचर्या ही ऐसी होती है जिसके कारण उसकी प्रवृत्ति निरन्तर सदोष बनी रहती है, इसलिए उसे भी कृतिकर्म करने का उपदेश दिया गया है। Jain Education International सिद्धान्ताचार्य पं. फूलचन्द्र जी शास्त्री किया जा सकता है, पर तीन बार अवश्य करना चाहिए। यह तो हम आगे बतलानेवाले हैं कि तीन सन्ध्याकालों में जो कृतिकर्म किया जाता है, उसमें सामायिक, चतुर्विंशति-स्तव और वन्दना इन तीनों की मुख्यता है। इसलिए आजकल जिन विद्वानों और त्यागियों का यह मत है कि साधु को प्रतिदिन देव - वन्दना करनी ही चाहिए, ऐसा कोई नियम नहीं है उनका वह मत आगम-संगत नहीं जान पड़ता । तीनों सन्ध्याकालों में किया जानेवाला कृतिकर्म साधु और श्रावक दोनों का एक समान है। अन्तर केवल इतना है कि साधु अपरिग्रही होने से कृतिकर्म करते समय अक्षत आदि द्रव्य का उपयोग नहीं करते और गृहस्थ उसका भी उपयोग करता है । गृहस्थ का कृतिकर्म पर्यायवाची नाम 'मूलाचार' में कृतिकर्म के व्याख्यान के प्रसंग से विनय की व्याख्या करते हुए उसके पाँच भेद किये हैंलोकानुवृत्तिविनय, अर्थविनय, काम-विनय, भयविनय और कृतिकर्म के ‘मूलाचार' में पर्यायवाची नाम दिये हैंकृति - कर्म, चितिकर्म, पूजाकर्म और विनयकर्म । इनकी व्याख्या करते हुए वहाँ कहा गया है कि जिस अक्षरोच्चाररूप वाचनिक क्रिया के, परिणामों की विशुद्धि रूप मानसिक क्रिया के और नमस्कारादि रूप कायिक क्रिया के करने से ज्ञानावरणादि आठ प्रकार के कर्मों का 'कृत्यते छिद्यते' छेद होता है, उसे कृतिकर्म कहते हैं। यह पुण्यसंचय का कारण है, इसलिए उसे चितिकर्म भी कहते हैं। इसमें चौबीस तीर्थंकरों और पाँच परमेष्ठी आदि की पूजा की जाती है, इसलिए इसे पूजाकर्म भी कहते हैं तथा इसके द्वारा उत्कृष्ट विनय प्रकाशित होती है, इसलिए इसे विनयकर्म भी कहते हैं । यहाँ विनय की 'विनीयते निराक्रियते' ऐसी व्युत्पत्ति करके इसका फल कर्मों की उदय और उदीरणा आदि करके उनका नाश करना भी बतलाया गया है । तात्पर्य यह है कि कृतिकर्म जहाँ कर्मों की निर्जरा का कारण है, वहाँ वह उत्कृष्ट पुण्य- -संचय मे हेतु है और विनय गुण का मूल है, इसलिए उसे प्रमादरहित होकर साधुओं और गृहस्थों को यथाविधि करना चाहिए। समय- विचार मोक्षविनय । अर्थविनय, कामविनय और भय विनय ये संसार की प्रयोजक हैं, यह स्पष्ट ही है। लोकानुवृत्तिविनय दो प्रकार की है। एक वह जिसमें यथावसर सबका उचित आदरसत्कार किया जाता है और दूसरी वह जो देवपूजा आदि के समय की जाती है। यहाँ देवपूजा अपने विभव के अनुसार करनी चाहिए यह कहा है (मूलाचार, षडावश्यकाधिकार, गाथा 84 ) । इससे विदित होता है कि गृहस्थ कृतिकर्म करते समय अक्षत आदि सामग्री का उपयोग करता है। वह सामग्री कैसी हो, इसके सम्बन्ध में मूलाचार प्रथम अधिकार के श्लोक 24 की टीका में आचार्य वसुनन्दि कहते हैं, 'जिनेन्द्रदेव की पूजा के लिए गन्ध, पुष्प और धूप आदि जिस सामग्री का उपयोग किया जावे, वह प्रासुक और निर्दोष होनी चाहिए।' इससे भी गृहस्थ कृतिकर्म करते समय सामग्री का उपयोग करता है, इसकी सूचना मिलती है। । आलम्बन करते कृतिकर्म कब किया जाए, इस प्रश्न का समाधान हुए लिखा है कि कृतिकर्म तीनों सन्ध्याकालों में करना चाहिए। वीरसेनस्वामी अपनी धवला (कर्म-अनुयोगद्वार, सूत्र 28) टीका में कहते हैं कि यह तीन बार ही करना कृतिकर्म करने का मुख्य हेतु आत्मशुद्धि है । इसलिए यह विधि सम्पन्न करते समय उन्हीं का आलम्बन लिया जाता है, जिन्होंने आत्मशुद्धि करके या तो मोक्ष प्राप्त कर लिया है या जो अरहन्त अवस्था को प्राप्त हो गये हैं। आचार्य, उपाध्याय और साधु तथा जिन-प्रतिमा और जिनवाणी ये भी चाहिए ऐसा कोई एकान्त नियम नहीं है। अधिक बार भी । आत्मशुद्धि में प्रयोजक होने से उसके आलम्बन माने गये हैं। अगस्त 2005 जिनभाषित For Private & Personal Use Only 7 www.jainelibrary.org
SR No.524299
Book TitleJinabhashita 2005 08
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2005
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size4 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy