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________________ समाचार युवा जैन प्रतिभा सम्मान समारोह सात्विक भोजन करने की प्रेरणा देना और इस कार्य में उनकी परमपूज्य संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज | यथासंभव मदद करना। के आशीर्वाद से उनके परम शिष्य पूज्य मुनिश्री क्षमासागर जी, 5. उच्च शिक्षा हेतु जैन छात्र-छात्राओं को स्कॉलरशिप मुनिश्री भव्य सागर जी के सान्निध्य में यंग जैना एवार्ड म.प्र. की | एवं अवार्ड देकर प्रोत्साहित करना। उद्योग नगरी अशोकनगर में 23 व 24 अक्टूबर वर्ष 2004 को 6. जैन छात्र-छात्राओं को भारतीय संस्कृति और नैतिक हजारों की उपस्थिति के बीच आयोजित हुआ। | मूल्यों के प्रति जागरूक करना। यह सम्मान शिक्षा के क्षेत्र में अच्छी सफलता पाने वाले | पूज्य मुनिश्री क्षमासागर जी ने अपने आशीर्वाद में कहा जैन छात्रों को प्रतिवर्ष दिया जाता है। इसका उद्देश्य युवाओं से कि आप अच्छा सोचें, अच्छा करें। यंग जैना अवार्ड में सम्मिलित मधुर संवाद स्थापित करना, सामाजिक स्तर पर उनकी प्रशंसा सभी युवाओं से मिलकर अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव कर रहा हूँ। करना और उन्हें नैतिक मूल्यों के प्रति जागरूक करना है। मुख्य इन आत्मीय और दुर्लभ क्षणों में यदि धर्म, दर्शन, अध्यात्म और अतिथि श्रीमती प्रतिभा जैन जयपुर जिला एवं सत्र न्यायाधीश विज्ञान की स्पष्ट छवि हमारे हृदय में अंकित हो सके और हम श्रीमति विमला जैन भोपाल ने प्रत्येक बच्चे को गले में मैडल अपने जीवन को अच्छा बनाने के लिए संकल्पित हो सकें, तो यह पहनाकर ट्रॉफी प्रदान कर सम्मानित किया। युवा जैन प्रतिभा | इस सम्मान समारोह की श्रेष्ठतम उपलब्धि होगी। सम्मान समारोह का कार्यक्रम दिनांक 24.10.2004 को प्रात: 8 हमें यह जानकर गौरव होना चाहिए कि अहिंसा, करूणा बजे व दोपहर 12:30 से प्रारंभ हुआ। और प्रेम हमारा धर्म है। सत्य के प्रति समर्पित होकर निरन्तर आत्म सर्वप्रथम मैत्री समूह के संदेश और उद्देश्य श्री पी.एल. विकास करना हमारा दर्शन (फिलॉसॅफी) है। आत्म-संतोष और बैनाडा जी ने कार्यसभा को अवगत कराये। उन्होंने अपने उद्बोधन साम्य-भाव रखना हमारी आध्यात्मिक चेतना का मधुर स्वर है। में कहा कि, 'आपने अपने जीवन में खब मेहनत और लगन से जो। श्रद्धा और सदाचार से समन्वित ज्ञान ही हमारा विज्ञान है। सफलता अर्जित की उससे समूची जैन समाज गौरवान्वित हुई है। यह सच है कि आज वातावरण में अनेकों विकृतियाँ और आपको यंग जैना अवार्ड से सम्मानित करते हुए हमारी हार्दिक | विषमताएँ हैं। इसके बावजूद भी हमारा कर्तव्य है कि हम अच्छा भावना है कि आपका व्यक्तित्व उज्जवल बने। आपका जीवनऔरों | सोचें और अच्छा करें। भोगवादी सभ्यता के निरन्तर बढ़ते दबाव को सदप्रेरणा दे। आपअपनी संस्कति. समाज, धर्म और देश की | के बावजूद हम स्वस्थ, संतुलित और मर्यादित जीवन जीने की गरिमा को बनाए रखने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते रहें। कला सीखें। खान-पान और रहन-सहन में निरन्तर बढ़ती हुई किसी एक विधा में प्रवीण होने से जीवन में सुंदरता, विलासिता के बावजूद भी हम सादगी और शालीनता को बढ़ावा पूर्णता और कलात्मकता नहीं आती। जीवन के सर्वांगीण विकास दें। देश में तेजी से फैलती हुई हिंसा, झूठ, चोरी, अश्लीलता और के लिए इन्द्रधनुष के रंगों की तरह जीवन में भी विविधता होनी अंडा, मांस, शराब जैसी बुरी आदतों से बचकर हम नैतिक और चाहिए। कला, शिल्प, वाणिज्य और विज्ञान की नई-नई विधाओं चारित्रिक रूप से सुदृढ़ बनें। की तरफ बढ़ने का उत्साह होना चाहिए। जीवन में गतिशीलता संयुक्त परिवारों के विघटन और संबंधों के बीच बढ़ती और रचनात्मकता का समावेश भी होना चाहिए। आप पढाई का हुई औपचारिकता के बावजूद भी हम परस्पर आत्मीयता और अर्थ मात्र एक बेहतर नौकरी हासिल कर लेना न समझें बल्कि सहजता कायम रखने का प्रयास करते रहें। धार्मिक आयोजनों, पढ़ लिखकर एक संवेदनशील बेहतरीन इंसान बनें।' धर्मस्थलों और धर्मगुरूओं में निरन्तर बढ़ते आडम्बर और प्रदर्शन मैत्री समूह के उद्देश्य को बढ़ावा न देते हुए हम धर्म की तर्कसंगत, वैज्ञानिक सही 1. जैन धर्म, दर्शन और अध्यात्म के व्यवहारिक एवं | समझ विकसित करने के लिए प्रयत्नशील रहें। वैज्ञानिक स्वरूप को प्रस्तुत करना । शिक्षा के माध्यम से हम अपने जीवन को सहज, सरल 2. जैन छात्र-छात्राओं की बहुमुखी प्रतिभा को विकसित | और संवेदनशील बनाएँ। हम पढ़-लिखकर धन-पैसे के लालच करने का प्रयत्न करना। में हिंसक उद्योग-धंधों को न अपनाएँ, बल्कि अपनी अहिंसक 3. प्रतिभावना जैन छात्र-छात्राओं को उच्चशिक्षा हेतु उचित संस्कृति और धर्म की गौरवशाली परम्परा को आगे बढ़ाने में मार्गदर्शन देना और उनसे सतत् सम्पर्क बनाये रखना। अपना महत्वपूर्ण योगदान दें। 4. उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले जैन छात्र-छात्राओं को हमें विश्वास है कि इस सम्मान समारोह में सहभागी अध्ययन के दौरान जिनदर्शन, दिन में भोजन और शाकाहारी | सभी प्रतिभाशाली युवा हमारी भावनाओं का सम्मान करेंगे और 28 नवम्बर 2004 जिनभाषित- - Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524291
Book TitleJinabhashita 2004 11
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2004
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size5 MB
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