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________________ स्थापना करके उन्हें आरोपित महाव्रती बना सकें। इसका | जाता है कि समाधि मरण के समय में जो श्रावक नग्न लिंग अर्थ मुनि दीक्षा नहीं है। क्योंकि ऐसा करना तो आर्यिका व धारण करके आरोपित महाव्रती बनते हैं उनको आशाधरजी क्षुल्लिका श्राविका के लिए भी लिखा है तो क्या नग्न हो ने मुनि नहीं माना है। यहां यह भी ध्यान रखना चाहिए किजाने से इनकी भी मुनि दीक्षा मान ली जावे? और तब क्या | आशाधर ने जो यहां नग्नलिंग धारणकर आरोपित महाव्रती उनके छठा गुणस्थान समझा जावे? नग्न हो जाना मात्र कोई बनने की बात लिखी है। वह भी आपवादिकलिंगी कहिये मुनि दीक्षा नहीं है। मुनि दीक्षा में लौंच कराया जाता है, | क्षुल्लक के लिये लिखी है न कि 7 वीं प्रतिमाधारी ब्रह्मचारी पिच्छिका पकड़ाई जाती है। पर यहां ऐसा कुछ नहीं लिखा आदि के लिए। पं. मेधावी ने भी स्वरचित धर्मसंग्रह श्रावकाचार है। न यहां उनको मुनि नाम से लिखा है। तब यह कैसे माना | के 9वें अध्याय में उत्कृष्ट श्रावक को अपवादलिंगी कहा है। जावे कि समाधिमरण के वक्त में क्षुल्लक को मुनि दीक्षा देने यथाका विधान है। यदि कहो कि क्षुल्लक के लौंच पिच्छी तो उत्कृष्टः श्रावको यः प्राक्क्षुल्लोऽत्रैव सूचितः। पहिले से ही चली आ रही है जिससे नहीं लिखा है। इसका स चापवादलिंगी च वानप्रस्थोऽपि नामतः ।। 280॥ उत्तर यह है कि भले ही पहिले से चली आवे तब भी मुनि अर्थ - उत्कृष्ट श्रावक जिसे कि पहिले इस ग्रन्थ में दीक्षा के वक्त भी लौंचादि करा कर ही दीक्षा दिए जाने का | क्षुल्लक नाम से सूचित किया है उसी का नाम अपवादलिंगी नियम है। और सभी क्षुल्लक लौंच करें ऐसी भी शास्त्राज्ञा और वानप्रस्थ भी है। नहीं है। इसलिए यह भी नहीं कह सकते कि क्षुल्लक लौंच इस प्रकार पं. आशाधर जी के उक्त विवेचन से यही पहिले से ही चला आ रहा है। यह विचारने के योग्य है कि- | फलितार्थ निकलता है कि- जिस श्रावक को समाधिमरण उक्त श्लोक 44 में क्षुल्लक में महाव्रतों का आरोप करना | के अवसर में नग्नलिंग दिया जाता है वह 11वीं प्रतिमाधारी लिखा है। इस आरोप शब्द पर भी ध्यान देना चाहिए। | उत्कृष्ट श्रावक होता है और वह आरोपित महाव्रती माना रत्नकरंडश्रावकाचार के आरोपयेन्महाव्रतमामरणस्थायि | जाता है मुनि नहीं। उस समय की नग्नता मुनि अवस्था की निः शेषम्' ॥ 125 ॥ पद्म में भी सभी महाव्रतों का आरोप नहीं है। किंतु सन्यास अवस्था की है। ऐसा समझना चाहिए। करना ही लिखा है। मेधावी के श्रावकाचार में (अधिकार इसलिये आजकल जो 11वीं प्रतिमाधारी ही नहीं सातवीं प्रतिमाधारी ब्रह्मचारी तक को भी समाधिमरण के समय में ही लिखा है। सभी ग्रन्थों में एक आरोप के सिवा दूसरा शब्द साक्षात् मुनि बनाकर व उसका नाम ही बदलकर मुनिपने का प्रयोग न करने में भी कोई रहस्य और इससे यही प्रतिभाषितनाम रख दिया जाता है यह सब शास्त्र सम्मत नहीं है। होता है कि -सन्यास काल में नग्न होने का अर्थ मुनि बनने | मनमानी है। मैंने यह लेख मननशील विद्वानों के विचारार्थ का नहीं है। जिस पुरूष की कामेन्द्रिय में चर्मरहितत्व आदि | प्रस्तुत किया है। मेरा लिखना कहां तक सही है इसका दोष होते हैं उसको मुनिदीक्षा देने का आगम में निषेध किया | निर्णय वे करेंगे। निर्णय करते समय यह ख्याल रखेंगे किहै। उस प्रकार के दोषवाले क्षल्लक के ऊपर उदधृत श्लोक | आशाधर ने समाधिमरण के इस प्रकरण में नग्नलिंग की 35 में सन्यास काल में नग्नलिंग दिया गया है। इससे भी | चर्चा की है, न कि मुनि होने की। क्योंकि यहां इसी के साथ यही सिद्ध होता है कि-यहां की इस नग्नता का मुनिदीक्षा से | में आर्यिका व श्राविका के सम्बन्ध में नग्नता का कथन कोई सम्बन्ध नहीं है । चारित्रसार में लिखा है कि गूढ़ ब्रह्मचारी | किया है। इससे यही सिद्ध होता है कि यहां जो वर्णन किया नग्न वेष में रहकर ही विद्याध्ययन करता है। इसलिए सभी | है वह नग्नलिंग का वर्णन किया है मुनि होने का वर्णन नहीं जगह नग्न हो जाने का अर्थ मुनि बनना नहीं है। सागराधर्मामृत | किया है। अत: उसका अभिप्राय मुनिदीक्षा समझना उचित के इसी 8वें अध्याय के अन्त में आराधक के उत्तम, मध्यम, | नहीं है। नग्न हुए बाद भी उसको महाव्रत देने की बात नहीं जघन्य तीन भेद करके उनकी आराधनाओं का फल बताते | लिखी है। ऊपर उद्धृत आशाधर के 44 वें श्लोक पर ध्यान हुए लिखा है कि- "उत्तम आराधक मुनि उसी भव में मोक्ष | दीजिए। उसमें वह निर्यापक के वचनों से अपने में महाव्रतों जाता है। मध्यम आराधक मुनि इन्द्रादि पद को प्राप्त होता है। | का आरोपण करके महाव्रतों की भावना भावे, ऐसा लिखा और वर्तमान काल के मुनि जो कि जघन्य आराधक हैं वे है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि वह नग्न हुए बाद "मैं आते हैं। इतना कथन किये बाद आगे | महाव्रती हूँ" ऐसी कल्पना कर लेवे। साक्षात् महाव्रती मुनि आशाधर जी लिखते हैं कि यह तो मुनियों की आराधना | अपने को न माने। रत्नकरंडश्रावकाचार के उक्त उद्धरण में अर्थात् समाधिमरण का फल बताया। अब श्रावकों की | आये "आरोपयेत्" की व्याख्या प्रभाचन्द्र ने भी महाव्रतों की आराधना का फल बताते हैं। जो कि श्रमणलिंग धारण कर | स्थापना करना की है। धारण करना अर्थ नहीं किया है। समाधिमरण करते हैं।" इस कथन से बिल्कुल स्पष्ट हो । 'जैन निबन्ध रत्नावली' से साभार अगस्त 2004 जिन भाषित 7 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org Jain Education International
SR No.524288
Book TitleJinabhashita 2004 08
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2004
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size5 MB
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