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________________ किन्तु इन दोनों आचार्यों ने कुन्दकुन्द के द्वारा समयसारादि | शताब्दी ई. के सौ दो सौ वर्ष पूर्व ही हुए थे। कुन्दकुन्द के ग्रन्थ रचे जाने की बात नहीं कही। सर्वप्रथम ईसा की | ग्रन्थों पर पहली टीका भले ही दसवीं शती ई. में लिखी गई बारहवीं सदी में आचार्य जयसेन ने कुन्दकुन्द को उक्त | हो, पर उनके ग्रन्थों की गाथाएँ ईसा की पहली, दूसरी, ग्रन्थों का रचयिता बतलाया है और उनके कुछ समय बाद | पाँचवीं, छठी, सातवी, आठवीं शताब्दियों के भगवती 12 वीं शती ई. में ही हुए माइल्ल धवल ने लिखा है कि आराधना, मलाचार, तिलोयपण्णत्ती. सर्वार्थसिद्धि. मैंने कुन्दकुन्दाचार्य रचित शास्त्रों से सारभूत अर्थ ग्रहणकर | परमात्मप्रकाश, विजयोदया टीका. धवला-जयधवला आदि द्रव्यस्वभाव -प्रकाशक-नयचक्र की रचना की है। उन्होंने | ग्रन्थों में आत्मसात् की गयी हैं अथवा प्रमाण रूप में उद्धृत पंचास्तिकाय आदि ग्रन्थों को आगम कहकर, उनसे अनेक | | की गई हैं। यह इस बात का ज्वलन्त प्रमाण है कि कन्दकन्द उद्धरण भी दिये हैं। इससे ज्ञात होता है कि आचार्य जयसेन | ईसापूर्वोत्तर (ईसापूर्व और ईसोत्तर) प्रथम शताब्दी में हुए को कुन्दकुन्द के समयसारादि ग्रन्थों के रचयिता होने की थे। जानकारी किसी प्राचीन लिखित स्रोत से प्राप्त हुई थी। इस | । जहाँ तक टीका न लिखे जाने का प्रश्न है, उसका तरह यह बात समझ में आ जाती है कि ईसा की बारहवीं | कारण यह प्रतीत होता है कि कुन्दकुन्द के कुछ ही समय शतब्दी से पहले के ग्रन्थकारों ने कुन्दकुन्द के नाम का | बाद जैन सिद्धांत को संक्षेप एवं सरल भाषा में प्रस्तुत उल्लेख क्यों नहीं किया। इसका एकमात्र कारण उनका इस | करनेवाला तत्त्वार्थसत्र जैसा महत्त्वपर्ण ग्रन्थ सामने आ गया। बात से अनभिज्ञ होना था कि समयसारादि ग्रन्थों के कर्ता वह इतना लोकप्रिय हआ कि उसने आचार्यों को उसी पर वही कन्दकन्द हैं, जिनके नाम से कुन्दकुन्दान्वय प्रसूत | टीकाएँ लिखने लिए प्रेरित किया। इसीलिए हम देखते हैं हुआ है। कि पूज्यपाद स्वामी के पहले से ही उस पर टीकाएँ लिखी अत: दसवीं शती ई. के पूर्व तक कुन्दकुन्द के ग्रन्थों | जाने लगी और यह क्रम श्रुतसागर सूरि तक अनवरत चलता पर टीका न लिखा जाना तथा बारहवीं शती ई. के पूर्व तक | रहा। फलस्वरूप 10वीं शती ई. के पूर्व तक कुन्दकुन्द के ग्रन्थकारों द्वारा कुन्दकुन्द के नाम का उल्लेख न किया | अध्यात्मप्रधान ग्रन्थों पर टीका का अवसर नहीं आ पाया। जाना इस बात का प्रमाण नहीं है कि कुन्दकुन्द दसवीं | ए/2 मानसरोवर, शाहपुरा, भोपाल बालवार्ता वह देना सीख रही है डॉ. सुरेन्द्र कुमार जैन एक सज्जन परदेश में एक घर के सामने पहुँचे।। अपने ठिकाने पर वापिस आ गये। उन्हें जोर की भूख लगी थी। उन्होंने उस घर की गहिणी | तीसरे दिन उन सज्जन ने पुनः उसी गृहिणी के घर से निवेदन किया कि 'मुझे भूख लगी है, कुछ भिक्षा | की ओर रुख किया तो उनके साथी से रहा नहीं गया। दीजिए।' उनका यह कथन सुनकर गृहिणी गालियाँ देती | वह बोला, "गुरुदेव! उस गृहिणी ने दो बार आपका हुई किबाड़ बन्द कर घर के अन्दर चली गयी। अपमान किया, फिर भी आप उससे ही भिक्षा की आशा वह सज्जन भी वापिस आ गये, मानो साधुता की | | रखते हैं?" कसौटी पर स्वयं को कसकर आ रहे हों। उनके साथ साथी के प्रश्न सुनकर वे सज्जन बोले, "भाई, उनका एक साथी और था, जो विस्मय और ग्लानि से | सहनशीलता ही सज्जनता है। तुमने देखा कि पहले दिन यह दृश्य देख अवाक् था। भोजन माँगने पर उसने गालियाँ दीं, दूसरे दिन भोजन दूसरे दिन वे सज्जन पुनः उस गृहिणी के घर के | माँगने पर राख दी। मेरा विश्वास है कि आज तीसरे दिन सामने पहुँचे और पुनः याचना की। आज वे अपने साथ / वह भोजन भी देगी। वास्तव में वह देना (दान देना ) पात्र भी लाये थे, अतः भोजन की इच्छा के साथ पात्र | सीख रही है। इसलिए मैं शान्तचित्त एवं आशान्वित हूँ।" आगे कर दिया। वास्तविकता भी यही है जिनके संस्कार दानशीलता गृहिणी ने कुटिल मुस्कान के साथ कहा, "ठहरो, मैं | के नहीं हैं, वे दें भी कैसे? दान के संस्कार सिखाना भी अभी देती हूँ," और अन्दर से राख लाकर पात्र में डाल आवश्यक है। दी तथा बड़बड़ाते हुए अन्दर चली गयी। खैर, वे सज्जन एल-65,न्यू इन्दिरानगर, बुरहानपुर, म.प्र. 14 अगस्त 2004 जिन भाषित - Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524288
Book TitleJinabhashita 2004 08
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2004
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size5 MB
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