________________
मोक्षपथ के सजग प्रहरी मुनिश्री १०८ प्रवचनसागर जी
ब्र. पवन जैन एवं ब्र. कमल जैन
बाल ब्र. चन्द्रशेखरजी मध्यम कद, स्वर्ण सा दैदीप्यमान शरीर, द्रुत विलम्ब से रहित गमन, सदैव प्रसन्न मुद्रा, विषम परिस्थिति में अन्दर से प्रसन्न रहना, सफेद धोती- दुपट्टा, हाथ में मार्जन, साधर्मी के प्रति हृदय से वात्सल्य, मृदुभाषी, सरल परिणामी, आंखों झरता करुणारस, मितभाषी, अकालवर्जित स्वाध्याय, शेष समय
परम पूजनीय मितभाषी वात्सल्य प्रदाता बालयोगी मुनि । चन्द्रशेखरजी को इन्दौर आश्रम भेज दिया। वहाँ पर आप १९९३ से पुङ्गव श्री १०८ प्रवचनसागर जी महाराज का इस अल्पवय में १९९६ तक अधिष्ठाता पद पर आसीन रहे । इस पद को सम्हालते सल्लेखना पूर्वक देह विसर्जन की बात को सुनकर सारा देश शोक हुए भी आप पद पर आसीन नहीं रहे अर्थात् इस पद को लेने के बाद सागर में डूब गया। मुनिश्री जिस समय श्री वर्णी दिगम्बर जैन कभी भी आपके आवश्यकों में क्षति नहीं हुई। इसके बाद २० अप्रेल गुरुकुल पिसनहारी मढ़िया जबलपुर में अध्ययनरत थे, उस समय १९९६ को तांरगा जी सिद्धक्षेत्र में आपने आचार्य श्री से क्षुल्लक सन् १९९० से १९९३ तक उनके सानिध्य में अध्ययन करने का दीक्षा ग्रहण की और इसी वर्ष के दिसम्बर माह में दुपट्टा का भी सौभाग्य हम लोगों को प्राप्त हुआ, उस समय आप बाल ब्रह्मचारी व्यामोह छोड़कर ऐलक दीक्षा को स्वीकार किया । लगभग १० चन्द्रशेखर जी के नाम से विख्यात थे। आपका जन्म २९ अक्टूबर महीने तक ऐलक के व्रतों का पालन करते हुये १६ अक्टूबर १९९७ १९६० बेगमगंज, जिला - रायसेन (म.प्र.) में हुआ था । को बाह्य आभ्यांतर परिग्रह को त्याग कर मुनि श्री १०८ प्रवचनसागर जी बने और निर्दोष रीति से २८ मूलगुणों का पालन करते हुए प्रतिदिन अन्तराय वाले अथवा अस्वस्थ साधुओं की सेवा दिन में दो बार करते थे। एक बार मुनिश्री से हमने पूछा महाराज आपको सेवा करने में प्रमाद नहीं आता, आप रोज दस -पांच साधुओं की सेवा करते हो, आप थक जाते होंगे, तब महाराज श्री ने उत्तर दिया कि भैया, साधुओं की वैयावृत्ति करना वह तो हमारा अन्तरंग तप है। यदि वैयावृत्ति नहीं करेंगे सो हमारा एक तप कम हो जायेगा। इस तरह से दोनों प्रकार के तपों के साथ में अपना समय व्यतीत करते हुए, आचार्यश्री के चरण सान्निध्य में अपना जीवन व्यतीत किया।
एक बार बहोरीबंद पंचकल्याणक के लिए मुनि प्रवचन सागरजी ४ मुनिराजों के साथ जबलपुर पधारे, तब मुनिश्री से हमने पूछा कि हे स्वामिन्! आचार्यश्री को छोड़कर आपने अलग विहार कैसे कर लिया। तब आप बोले, हमने कहाँ छोड़ा और निम्नलिखित पंक्ति सुनाई ।
प्रभु स्मरण की गुनगुनाहट, पूजन, भोजन, अध्ययन, शयन में समय की नियमबद्धता, शक्ति सीमित पर उसी में सन्तुष्ट, जलगालन, मलमोचन आदि प्रत्येक क्रिया विवेक पूर्वक सम्पन्न करना, विपरीत वातावरण में भी शांत रहना, कड़वाहट पीकर भी वातावरण को मधुरता प्रदान करने में अद्भुत क्षमता रखने वाले, बस यही था
आपका अन्तर पटल ।
ऐसे उदार हृदय महामन: के पास लगभग तीन वर्ष साथ में रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। सबसे पहले आपने हम लोगों को पानी छानना सिखलाया था | चारित्र के प्रति आपकी अटूट आस्था थी । अणुव्रतों में क्वचित कदाचित कोई दोष लग जाता था तो आप तत्काल प्रायश्चित्त के रूप में रस त्याग या मालाएँ, एकाशन-उपवास आदि के द्वारा तत्काल व्रत शुद्धि करते थे । प्रातःकाल चार बजे से जब तक सूर्योदय नहीं होता था तब तक मालाएँ फेरते या चिन्तन करते थे। इसके बाद स्नानादि क्रियाओं के बाद घंटों जिनेन्द्र भक्ति करते थे। आपके पूजन के वस्त्र, पूजन के बर्तन, पूजन की श्रेष्ठ सामग्री हमेशा अपने पास रखते थे, इसमें कभी भी प्रमाद नहीं किया। हमारे विद्यागुरु पंडित प्रवर पन्नालाल साहित्याचार्य जी हमेशा कहा करते थे कि ब्र. चन्द्रशेखरजी बड़े गंभीर पुरुष हैं, ये आचार्य शांतिसागरजी की तरह शांत हैं। आहार दान में आपकी बहुत रुचि थी यदि कोई साधु परमेष्ठी का गुरुकुल में पदार्पण हुआ, तो आप उनकी परिचर्या में हमेशा आगे रहते थे। गुरुकुल में सन् १९९० से १९९३ के बीच में लगभग २०-२५ ब्रह्मचारी भाई अध्ययनरत थे उस समय प्रतिदिन सबसे पहले सब भाईयों को भोजन कराते थे बाद में आप करते थे। आप समाज के झगड़ों से और ख्याति लाभ से कोशों दूर थे। उसके बाद २५ जनवरी १९९३ में जबलपुर पंचकल्याणक
समय गुरुकुल में तीन भाईयों को संघ में रहने की आज्ञा प्राप्त हुई, जिसमें ब्र. अरविन्दजी (मुनि सुमतिसागरजी) को मुनि क्षमासागर जी के साथ भेज दिया, ब्र. राजेश जी को संघ में रख लिया और ब्र.
Jain Education International
तव पादौ मम हृदये, मम हृदयं तव पदद्वयं लीनं
इस वाक्य को सुनाकर बोले भैया ! गुरु की आज्ञा उल्लंघनीय नहीं होती। इस प्रकार के शांत स्वभावी साधु की समाधि की बात याद आती है तो आंखों में पानी आ जाता है। मुनिश्री परीषहों को भी बड़े समता भाव से सहन करते थे । २८.९.२००३ को अमरकंटक में जब आपको कुत्ता ने काटा, तब कुछ गहरे घाव हो गये थे, जो स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। उस समय किसी भक्त ने कहा कि कुत्ता के काटने पर यदि उस स्थान पर मिर्च लगा दी जाय तो जहर नहीं फैलता । तब किसी ने महाराज के उन घावों के ऊपर लालमिर्च बाँट करके लगा दी। घाव में मिर्च लगने की भयंकर पीड़ा को हंसते-हंसते सहन किया।
इस प्रकार अनेक उपसर्ग परिषहों को समता भाव से सहन करते हुये अपनी आयु के ४३ वें वर्ष में समाधिस्थ हुये ।
मुनिश्री का अभाव अपूरणीय है। वीर प्रभु से प्रार्थना है भुज्यमान पर्याय से च्युत होकर मनुष्य पर्याय पाकर अमिट पुरुषार्थ को धारणकर अक्षय चारित्र के रथ पर चढ़कर शीघ्र ही अनन्त तथा अक्षय सुख के अनन्तकाल भोगी हों। हम सब आपके चरणानुगामी हों, इसी भावना के साथ शत शत नमन ।
For Private & Personal Use Only
ईशरी आश्रम जनवरी 2003 जिनभाषित
7
www.jainelibrary.org