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________________ साहित्याचार्य डॉ. (पं.) पन्नालाल जी के पुण्य । पूर्व प्राचार्य, श्री एस. पी. जैन गुरुकुल उच्च.माध्य.विद्यालय खुरई, स्मरण पर आयोजित नव प्रतिभा प्रोत्साहन सागर रहे। इस सत्र में भी विषय विशेषज्ञ के रूप में डॉ. भागचन्द जी 'भास्कर' नागपुर, श्री ऋषभचन्द जैन 'फौजदार' वैशाली एवं संगोष्ठी : एक झलक डॉ. भागचन्द्र जैन 'भागेन्दु' दमोह उपस्थित थे। पूज्य मुनि श्री १०५ विभवसागर जी महाराज ने इस अवसर संगोष्ठी में प्रथम वक्ता के रूप में कु. चन्द्रकान्ता जैन, पर अपने उद्गार प्रकट करते हुए कहा कि डॉ. पं. पन्नालाल जी सागर 'आदिपुराण में प्रतिपादित शिक्षा शास्त्रीय मान्यताओं का ज्ञान के क्षेत्र में सूर्य के समान रहे। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, वर्तमान सन्दर्भ में परिशीलन' विषय पर शोध आलेख का वाचन लेकिन उनके द्वारा जो साहित्य सृजन किया गया है, वह अमूल्य किया। द्वितीय वक्ता के रूप में कु. रितु विश्वकर्मा दमोह ने 'जैन निधि के रूप में है। पं. जी के सिद्धान्तों, आदर्शों का अनुसरण दर्शन में ऊँकार की अवधारणा' विषय पर शोध आलेख का करके हम अपना जीवन उन्नत बना सकते हैं। हम उनके द्वारा वाचन किया। इसी मध्य साहित्याचार्य डॉ. पं. पन्नालाल जी के सृजित साहित्य, जिनवाणी का चिन्तन/मनन करें व उसे अपने कृतित्व व व्यक्तित्व पर आधारित स्मारिका वसंत परिमल २००३ जीवन में उतारें। यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजली होगी। का विमोचन श्रीमंत सेठ डालचन्द के कर कमलों द्वारा सम्पन्न श्री पी.सी. जैन, प्रोफेसर गणित विभाग, शासकीय विज्ञान हुआ। तत्पश्चात् विमोचित प्रतियाँ उनके द्वारा मुनिद्वय को भेंट की महाविद्यालय, सागर ने डॉ. पन्नालाल जी के प्रति श्रद्धांजली व्यक्त गईं। संगोष्ठी में अन्य वक्ताओं में श्री सुनील जैन, सागर ने 'भारतीय करते हुए उनकी जीवन शैली, साहित्य व शिक्षा के क्षेत्र में उनके ज्योतिष वाङ्मय में जैन ज्योतिष वाङ्मय का अवदान' व कु. अविस्मरणीय योगदान के ऊपर प्रकाश डाला। तत्पश्चात् वन्दना जैन, ने 'विदिशा जिला का जैन सांस्कृतिक वैभव' विषय राजनांदगाँव से आगत प्रथम प्रतिभागी श्रीमती अनीता जैन ने नव पर प्रकाश डाला। पूर्व शिक्षामंत्री श्री प्रकाश जैन गिड्डे ने अपने प्रतिभा प्रोत्साहन संगोष्ठी में 'गृहस्थ जीवन में ध्यान व योग' सम्बोधन में पं. पन्नालाल जी साहित्याचार्य को जैन समाज का विषय पर अपने पत्र का वाचन किया। द्वितीय वक्ता के रूप में कु. श्रेष्ठ विद्वान बताते हुए अपनी श्रद्धांजली अर्पित की। शोध पत्रों के रेखा जैन, दमोह ने 'जैन अनुशासन के मूलतत्त्व' विषय पर शोध वाचन के उपरान्त मुनिश्री १०५ विभवसागर जी महाराज के आलेख प्रस्तुत किया। श्री ऋषभ समैया 'जलज' सागर ने पं. मांगलिक प्रवचन हुये। तत्पश्चात् आगत विद्वज्जनों ने पं. जी के पन्नालाल जी पर भावपूर्ण कविता का पाठ कर श्रोताओं को प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित किये। मुख्य अतिथि श्रीमंत सेठ डालचन्द भावविह्वल कर दिया। मुख्य अतिथि डॉ. जीवनलाल जी ने सुप्रसिद्ध जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि पं. जी ज्ञान के भंडार थे। उन्होंने साहित्य मनीषी डॉ. पन्नालाल जी के प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित अपनी गतिशील लेखनी से आगम ग्रन्थों के अध्ययन, स्वाध्याय करते हुए कहा कि पं. जी ज्ञान व आचरण के अद्भुत संगम थे। का सुगम मार्ग उपलब्ध कराया है। वह सदैव स्मरणीय रहेगा। उनके अपने गुरु के प्रति असीम समर्पण के भाव थे। उनकी आज्ञा कार्यक्रम अध्यक्ष डॉ. नेमीचन्द्र जी ने कहा कि पं. जी संपूर्ण देश को शिरोधार्य कर उन्होंने श्री गणेश वर्णी संस्कृत महाविद्यालय, के गौरव थे। देशवासी उनकी सराहनीय सेवाओं के लिये उन्हें सागर में अल्प वेतन पर ही अपनी दीर्घकालीन सेवायें दीं। उच्चवेतन युगों-युगों तक याद रखेंगे। इस कार्यक्रम में अनेक विद्वज्जनों व पर कहीं भी अन्यत्र जाने की भावना नहीं की। ऐसे उनके गुरु के श्रेष्ठी वर्ग का समागम हुआ। प्रति त्याग के भाव रहे। पं. जी अध्ययन व अध्यापन कार्य में राकेश जैन निरन्तर मन, वचन व कर्म से संलग्न रहा करते थे। यही उनकी दिल्ली में प्रशिक्षण शिविर सानंद सम्पन्न सफलता का सूत्र रहा। श्री वर्णी दि. जैन गुरुकुल पिसनहारी मढ़िया, जबलपुर के कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ. नेगी ने अपने उद्बोधन में कहा तत्त्वावधान में १५ मई से २५ मई २००३ तक दिल्ली में विभिन्न कि- पं. पन्नालाल जी अपने गुरुवर प्रातःस्मरणीय पूज्य गणेशप्रसाद स्थानों पर अध्यात्मिक एवं धार्मिक प्रशिक्षण शिविर सम्पन्न हुआ। जी वर्णी की वाणी थे। वर्णी जी के मनन, चिन्तन व आदर्शों को जिसमें आर्यपुरा (सब्जी मंडी), शालीमार बाग आदि के हजारों उन्होंने हृदयंगम कर उन्हें अपनी लेखनी से उतारा है। पं. जी जैन श्रद्धालुओं ने भाग लेकर धर्म लाभ लिया। प्रशिक्षण प्रदान करने दर्शन के मूलसिद्धान्त सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान व सम्यक्चारित्र की श्री वर्णी गुरुकुल से अधिष्ठाता श्री ब्र.जिनेश जी शास्त्री',ब. महेश त्रिवेणी थे। जी, ब्र. त्रिलोक जी, ब्र. नरेश जी, ब्र, महेन्द्र जी एवं ब्र. पुष्पेन्द्र जी संगोष्ठी का द्वितीय सत्र अपराह्न २.३० बजे परम पूज्य एवं विजय भाईसाहब् पहुँचे थे। मुनिद्वय श्री विभवसागर जी महाराज एवं मुनिश्री विश्वशीलसागर प्राचार्य जी महाराज के मंगल सान्निध्य में प्रारंभ किया गया। इस सत्र में श्री वर्णी दि. जैन गुरुकुल मुख्य अतिथि श्रीमंत सेठ डालचन्द जैन, पूर्व सांसद व कोषाध्यक्ष, उ.मा.वि.मढ़िया जी म.प्र. कांग्रेस कमेटी (ई) सागर तथा अध्यक्ष डॉ. नेमीचन्द जैन, | जबलपुर (म.प्र.) 30 जून 2003 जिनभाषित - Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524274
Book TitleJinabhashita 2003 06
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2003
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size4 MB
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