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४ ११) ५. भु. म. श्री पुष्यविन्या पत्र [४५७ संभाव्यमान जैन समाजके ऐक्यको भी बड़ा भारी धोखा पहुंचाया है। और इस प्रकार आपने अपने हाथमें आये हुए एक पुण्य प्रसंगको खो दिया है। मुझे तो आज यही प्रतीत हो रहा है कि अनेकान्त मासिककी शुरूके श्रीयुक्त बाबू जुगलकिशोरजी मुख्तार महाशय और थे, और आजके मुख्तार महाशय कोई और ही हैं। अन्यथा आजकी परिस्थितिमें आपने जो सरणी पसंद की है ऐसा कभी होने न पाता। और इस व्यामोहपूर्ण दशामें आपने प्राचीनतम श्वेताम्बर जैन साहित्यको अर्वाचीन,-जो कि आजकी संशोधनप्रधान पद्धतिसे प्राचीनतम सिद्ध हैं,-बतानेका प्रयत्न किया है; और दिगम्बर जैन साहित्यको प्राचीन,जो कि आजकी संशोधन पद्धतिसे सिद्ध नहीं हुआ है, और जिसके लिये अनेक काल्पनिक एवं भ्रमपूर्ण प्रमाण दिये जा रहे हैं,-सिद्ध करनेका प्रयत्न कर रहे हैं और उसके आधार पर एक बडा भारी साम्प्रदायिक विवाद खडा कर रहे हैं यह एक अति विवित्र वस्तु मालुम होती है। अस्तु, आज इस विषयमें आपको अधिक लिखना अर्थरहित है। सिर्फ मैं आपको संक्षेपमें इतना ही सूचित करता हूं कि आपकी ओरसे प्रचारित “वीरशासनजयन्तीमहोत्सव' के साथ मैं अपनाकोई भी प्रकारका सहकार नहीं रखता है। क्यों कि वह प्रामाणिक ऐतिहासिक तत्व एवं सन्निष्ठासे पर है । ____ अन्तमें आपसे एक बात सूचित करता हूं कि “जयन्तीमहोत्सव के विषयमें आपके साथ मेरा प्रामाणिक मतभेद होने पर भी आज तक जो अपना चिरकालीन पारस्परिक साहित्य विषयक संबंध चला आ रहा है वह निराबाध ही है । धर्मकार्यमें सविशेष प्रयत्नशील रहे । योग्य धर्मकार्य लिखते रहे ।
लि. मुनि पुण्यविजयका सस्नेह धर्मलाभ और सुखशाता. ता. क. में चाहता हूं कि-यह पत्र अनेकान्तमें प्रसिद्ध किया जाय ।
ફકત સાથે જ પાનાં અમદાવાદના સામયિક પત્રકાર મંડળ તરફથી, કાગળનિયમન ધારાની એક કલમને જે રીતે અર્થે કરવામાં આવ્યો હતો તેના આધારે અમે ગયા અંકમાં જણાવ્યું હતું કે—હવે પછી “શ્રી જૈન સત્ય પ્રકાશ” નું કદ ૨૪ પાનાં જેટલું પ્રસિદ્ધ કરી શકાશે.
પણ એ કલમનો જે અર્થ કરવામાં આવ્યો હતો તેમાં ફેરફાર કરે પડે છે. અને એ ફેરફારનું પરિણામ એ આવ્યું છે કે હવે પછી “શ્રી જૈન સત્ય પ્રકાશ” નાં ૨૪ નહીં પણ ફક્ત ૧૬ જ પાનાં આપી શકાશે.
વાચકને આની નોંધ લેવા વિનતિ છે. – તંત્રી
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