________________
१९४
(२१)
राधनपुर - विजयजिनेन्द्रसूरिजीने विजैवापुरथी पं. चतुरसागरगणिनो पत्र
अनुसन्धान- ६४
सं. मुनि सुयशचन्द्र - सुजसचन्द्रविजय
प्रस्तुत पत्र राधनपुरमा बिराजमान विजयजिनेन्द्रसूरिजीने उद्देशीने विजैवापुरना श्रीस पाठव्यो छे. मङ्गलाचरणमां आदिनाथ, शान्तिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ तथा वीरप्रभुने नमस्कार करी कविए गुर्जर भूमिना मुकुटसमान शत्रुञ्जयतीर्थाधिराजनुं वर्णन कर्तुं छे. त्यार पछीनी ढाळोमां अनुक्रमे राधनपुरनगरनुं, १०८ गुणवैभवनं, गुरुभगवन्तनी प्रभावकतानुं, गुरुभगवन्तना वंशादि ऐतिहासिक उल्लेखोनुं आलेखन . करी मरुधरदेशना विजैवापुरनुं, त्यांना श्रावकोनुं वर्णन कविए आलेख्युं छे. वीजैवा ते हाल वीजोवा एवा नामे प्रख्यात छे. श्रीसङ्घमां चातुर्मासमां थयेली आराधना त्यार पछीनी ढाळमां वर्णवाइ छे. सङ्घमां पूज्य श्रीनी पधरामणी माटेनी उत्कण्ठानुं वर्णन करतां ते पछीनां पद्यो पण सुन्दर छे. गद्य लेखमां मुडिया लिपिमां चातुर्मासिक आराधनांनी विगत फरी जणावी त्यांना राजादिनी तेमज श्रावकोनी महत्त्वपूर्ण विगत पद्यात्मक रीते गुंथाई छे. अहीं पधारता पंचतीर्थयात्रा थशे एवं प्रलोभन आपी चातुर्मास पधारवा विनति करे छे. वळी अत्र योग्य कामकाज जणाववा विनवे छे. पत्रान्ते पूज्य श्रीना सहवर्ती परिवारने वन्दनादि कही पोतानी साथेना साधुवृन्दनी वन्दना अवधारवा विनवी पत्र पूर्ण करे छे.
सम्पादनार्थे प्रस्तुत प्रतनी हस्तप्रत नकल आपवा बदल श्रीनेमिविज्ञानकस्तूरसूरिजी ज्ञानमन्दिरना व्यवस्थापकश्रीनो खूब खूब आभार. तेमज श्रीजंबूसूरिजी ज्ञानमन्दिरमांथी प्रस्तुत पत्रनी अन्य नकल आपवा बदल श्री जंबूसूरि ज्ञानमन्दिरना व्यवस्थापकोनो खूब खूब आभार.
Jain Education International
प्रस्तुत पत्र सचित्र ओळियारूप छे. तेनी लंबाई ३० फूट जेवी होवी जोईए. मूळ ओळियुं जोवा मळेल नथी, तेनी खण्डशः जे. नकल ज अमोने प्राप्त छे, तेथी चोक्कस साईज जाणवी शक्य नथी. आमां पत्रारम्भे १ साध्वीजी सामे ३ श्राविका - एवं रंगीन चित्र छे. पत्रमां एकथी वधु स्थाने रिक्तलिपिनां चित्र जोवा मळे छे. अत्रे पत्रमां जोडणी यथावत् जाळवी छे.
For Personal & Private Use Only
www.jainelibrary.org