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________________ जुलाई - २०१४ १७३ श्रीसंघ तुमनें विनवे अमने पार उतारोजी घणा दिवस भेट्यां हुया दरसन वेहला देखाडोजी ॥ राज० ॥२॥ दिनकर जिम उदय थयो रयणी विहांणीजी तिम तुम आवे थके पाप तिमर सवि नासेजी ॥ राज० ॥३॥ वाणी अतिह सोहांमणी अमृत सरखी सोहावेजी विधसउं आगम वांचिआं वरसावोजी इहांजी ॥ राज० ॥४॥ भविक जीवनें बौधवा तुमे स्वामिजी आवो, रातदिवस तुम ध्यावता संघने करो उजमालोजी ॥ राज० ॥५॥ श्रावक श्राविका विनवे तुम लागे पायजी वारोवार विंनवे करुणा कीजेजी सारजी ॥ रा० ॥६॥ जिहां जिहां तुमो विचरता तिहां तिहां नवनिध थावेजी पुन्यवंत जिहां विचरता तिहां भवपार उतारोजी ॥ रा० ॥७॥ जिहां जिहां तुम पगलां ठवो तिहां कुंमति नाठीजी सुमति आवी आदरे कुगति कीधी दूरजी ॥ रा० ॥८॥ देस देसना राजीया जिहां विचरो स्वामीजी तिहांना लोकने बूझता करता धर्मस्नेहजी ॥ रा० ॥९॥ इण पर विनती मानजो संघने करजौ प्रमाणोजी राजनगरनी विनती लख्यो लेख रसालोजी ॥ रा० ॥१०॥ ओछो अधिको जे लख्यो ते खमजो भगवानजी मात पिता आगल सही बालक बोले कालुंजी ॥ रा० ॥११॥ संवत अढ़ार बेंतालीसे कार्तिक मास मझार . 'लेख लख्यो सोहामनो राजनगरथी सारजी ॥ रा० ॥१२॥ पंडित श्रीकमजी तणो तसु सीस रवचंदोजी तसु सिस श्रीचंदने प्रभू करज्यो प्रमाणोजी ॥ २० ॥१३॥ इति श्री विनती चित्रलेख जे वाचे ते दीर्घायु चिरं नंदा(दता)त् श्रीश्रीश्रीश्री ॥ .. आ पछी श्रावकोना हस्ताक्षरो छ । -x Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.520565
Book TitleAnusandhan 2014 08 SrNo 64
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2014
Total Pages298
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size4 MB
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