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________________ जुलाई - २०१४ धन्यास्त एव वरकौशलदेशधन्या, यस्याऽऽगता प्रलुसजङ्गमकल्पवृक्षः । धन्यास्त एव नरनाथ नरः श्रियाणं, यः सेविता प्रभुपदाम्बुजस्तेऽपि धन्याः ॥१॥ चन्द्रायणो सहेर जुं कौसल मांहि अनेक पिछांनीये, एक एक तें एक अमोलक जानिये । गछपति रहे चोमास सुवास प्रभातियें । हरि हां, ता ते लछमणपुरीयें विशेष वखांनियें ॥१॥ अथ भट्टारकश्रीजिनचन्द्रसूरीश्वरपरमगुरुगुणवर्णनम्दोहा हवे गुण गाऊं गुरु तणा, सुणज्यो सहु सावधान । पट्ट परंपर परगडो, ठांम ठांम जस मांन ॥१॥ पूज्याराध्यतमोत्तमह, परमपूज्य गुणवंत । चारित्रपात्र - चूडामणि, साधु-सिरोमणि संत ॥२॥ कुमति - विध्वंसन - दिनकरु, सकल-कला- - संपूर्ण । विद्वज्जन- मुगटां-मणि, सरसती-कंठाभर्ण ॥३॥ चितामणि जिम दोहिलो, पांमीजे कृतपुण्य तिम श्री दर्शन स्वामिनो, जे पामे ते धन्य ॥४॥ सकल साधु सिरोमणि, गुण छत्रीस भण्डार । बुद्धिनिधान महाबली, सूरीश्वर सिरदार ॥५॥ छंद जाति भुजंगी सदा साधु आचार सारे सराहे, सहु ओपमा अंगमे रंग आहे । चुरासी - गच्छां राव दीपे सचावो, रिधुराज राजे खरो गच्छरावो ॥१॥ महायोगविद्यासणी मोह माया, कसे ठद्ध (?) अट्ठादिके कटुकाया । दमें पांच इन्द्री कीयो काम दूरे, च्यारुं ही कषायादि के चक्र चूरे ॥२॥ Jain Education International १४७ For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.520565
Book TitleAnusandhan 2014 08 SrNo 64
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2014
Total Pages298
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size4 MB
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