________________ मोक्ष का द्वार : सम्यक दृष्टि अचेतन तत्वों का जो भी उपयोग करता है, जो भी उपभोग करता | स्वामी न होने से कर्ता नहीं होता।' है, वह सब कर्मों की निर्जरा में सहायक होता है।' | यह गीता में तो बिलकुल ठीक था। तो कृष्ण की दृष्टि में साफ महावीर कहते हैं, सभी उपभोग बांधता नहीं; क्योंकि ध्यान भी था। लेकिन जैनों ने महावीर की दृष्टि को ऐसा लीपा-पोता है कि करोगे तो भोजन करना होगा। तो ध्यान के लिए भी शरीर जरूरी महावीर के ही वचन पराये मालूम पड़ते हैं। होगा। वेश्या के घर जाना है तो भी शरीर से ही चलकर जाओगे महावीर यह कह रहे हैं कि कोई तो ऐसे हैं, जागे होने के और मंदिर जाना है तो भी शरीर से ही चलकर जाओगे। किसी कारण, सेवन करते हुए भी सेवन नहीं करते; भोजन करते हुए की हत्या करनी हो तो भी ऊर्जा चाहिए, भोजन से मिलेगी; और भी उपवासे हैं; ठेठ संसार में खड़े हुए भी संसार के बाहर हैं। किसी की सेवा करनी हो तो भी ऊर्जा चाहिए, भोजन से ही / और कोई ऐसे भी हैं कि न सेवन करते हुए भी सेवन करते हैं। मिलेगी। भोजन छोड़ देने का सवाल नहीं है; भोजन का सम्यक उपवास किए हैं, लेकिन भोजन की कल्पना, भोजन की उपयोग कर लेने का सवाल है। वासना...! ब्रह्मचर्य का व्रत लिए हैं, लेकिन कामवासना की तो महावीर कहते हैं, 'सम्यक दृष्टि मनुष्य अपनी इंद्रियों के लहरें...! हिमालय पर बैठ गये हैं जाकर, लेकिन संसार की द्वारा चेतन तथा अचेतन द्रव्यों का जो भी उपभोग करता है, वह पुकार उन्हें अभी भी सुनायी पड़ती है। सब कर्मों की निर्जरा में सहायक होता है।' वह इसीलिए जीता है। तो असली सवाल बाहर से भाग जाने का नहीं है-भीतर से ताकि जीवन के पार जा सके। वह इसीलिए भोजन करता है। जाग जाने का है। ताकि भगवत्ता को पा सके। वह इसीलिए जल पीता है, ताकि फिर तुम भोग कर भी त्यागी हो सकते हो। और अगर वैसा न शरीर तृप्त हो, शांत हो, तो अंतर्गमन हो सके। उसकी दृष्टि हर हुआ तो तुम त्याग कर लोगे और भोगी ही रहोगे। घड़ी उस भीतर के सत्य पर लगी रहती है। वह उसी के लिए सारे गो मैं रहा रहीने-सितमहा-ए-रोजगार / जीवन को उपकरण बना लेता है। लेकिन तेरे खयाल से गाफिल नहीं रहा। श्रीमद्भागवत में एक वचन है : स्वयं हि तीर्थानि पुनन्ति संतः! रहा दुनिया की भीड़ में, रहा बाजार में, रहा उलझा संसार | संत पुरुष तीर्थों को पवित्र करते हैं। तीर्थों के कारण कोई पवित्र में...। नहीं होता; संत पुरुषों के कारण तीर्थ बन जाते हैं। जहां संत / गो मैं रहा रहीने-सितमहा-ए-रोजगार / पुरुष बैठता है वहीं तीर्थ बन जाता है। जहां तीर्थंकर चलते हैं -काम-धंधों में उलझा हुआ: 'लेकिन तेरे खयाल से वहीं तीर्थ बन जाते हैं। गाफिल नहीं रहा!' बस इतना ही कह सको तो काफी है। गंगा की खोज मत करो। तुम गंगा कभी न पहुंच पाओगे। तुम स्मरण बना रहा, सुरति सधी रही, ध्यान का धागा हाथ में दृष्टि को, सम्यकत्व को उपलब्ध हो जाओ-गंगा तुम्हारी खोज रहा–फिर रहो तुम बाजार में, तुम कमलिनी के पत्र की भांति करती चली जाएगी। नदी, नाला कोई भी तुम्हारे पास से गुजर सरोवर में पानी के बीच रहते हुए भी पानी से अस्पर्शित रहोगे। जायेगा, गंगा जैसा पवित्र हो जायेगा। वास्तविक मूल्य, महावीर कहते हैं, जैसे कोई आदमी विवाह इत्यादि का आत्यंतिक मूल्य तुम्हारे चैतन्य का है। आयोजन करता है....मुनीम, मालिक नहीं, तो बड़ी दौड़-धूप _ 'कोई तो विषयों का सेवन करते हुए भी सेवन नहीं करता।' करता है, इंतजाम करता है: बैंडबाजे लाओ, भोजन-पत्तल यह वचन सुनना! यह गीता में कहा गया होता तो अड़चन न सजाओ; लेकिन चूंकि वह मालिक नहीं है, इसलिए परेशान होती; यह महावीर ने कहा है। , नहीं है। रात घर जाकर सो जाता है मजे से। कोई याद भी नहीं इसको बहुत गौर से, होश से सनना। आती। काम था, कर दिया। कर्ता तो वह नहीं है। लेकिन 'कोई तो विषयों का सेवन करते हुए भी सेवन नहीं करता और | मालिक चाहे दौड़-धूप भी न कर रहा हो, सिंहासन पर बैठा हो, कोई न सेवन करते हुए भी विषयों का सेवन करता है। जैसे कोई लेकिन रात सो न पायेगा। उसकी लड़की का विवाह हो रहा है। पुरुष विवाह आदि कार्यों में लगा रहने पर भी उस कार्य का बड़ी चिंताएं पकड़ेंगी। चिंताएं विवाह के कारण नहीं पकड़तीं, 637 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrar org