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________________ दमकता था, जो अपनी आत्मा के समान दूसरे जीवों की रक्षा करते थे और इस संसार को समझकर निरंतर अपना तथा दूसरे जीवों का कल्याण करने में ही लगे रहते थे और ऐसे ही पूज्य पुरुषों का आप अपने आपको अनुयायी तथा उपासक भी बतलाते हैं जो ज्ञान-विज्ञान के पूर्ण स्वामी थे, जिनकी सभा में पशु-पक्षी तक भी उपदेश सुनने के लिए आते थे, जिन्होंने जैनधर्म धारण कराकर करोड़ों जीवों का उद्धार किया था और भिन्न धर्मावलंबियों पर जैनियों के अहिंसा धर्म की छाप जमाई थी इसलिए आप ही जरा विचार कीजिये कि क्या अपनी ऐसी हालत बनाना और दूसरों का उपकार करने से इस प्रकार हाथ खींच लेना अथवा जी चुराना आपके लिए उचित और योग्य है? कदापि नहीं । प्यारे धर्म बंधुओं हमें अपनी इस हालत पर बहुत ही लज्जित तथा शोकित होना चाहिये। हमारी इस लापरवाही (उदासीनता) और खामोशी (मौनवृत्ति) से जैनजाति को बड़ा भारी धक्का और धब्बा लग रहा है। हमने अपने पूज्य पुरुषों - ऋषिमुनियों के नाम को बट्टा लगा रखा है। यह सब हमारी स्वार्थपरता, निष्पौरुषता, संकीर्णहृदयता और विपरीत बुद्धि का परिणाम है। इसका सारा कलङ्क हमारे ही ऊपर है वास्तव में हम बड़े भारी अपराधी हैं जब हम अपनी आँखों के सामने इस बात को देख रहे हैं कि अज्ञान से अंधे प्राणी बिल्कुल बेसुध हुए मिथ्यात्वरूपी कुँए के सन्मुख जा रहे हैं और उसमें गिर रहे हैं, और फिर भी हम मौनावलम्बी हुए चुपचाप बैठे हैं- न उन बेचारों को उस कुँए से सूचित करते हैं, न कुँए में गिरने से बचाते हैं और न कुँए में गिरे हुओं को निकालने का प्रयत्न करते हैं, तो इससे अधिक और क्या अपराध हो सकता है? अब हमको इस कलङ्क और अपराध से मुक्त होने के लिए अवश्य प्रयत्नशील होना चाहिए। सबसे प्रथम हमें अपने में से इन स्वार्थपरता आदिक दोषों को निकाल डालना चाहिए। फिर उत्साह की कटि बांधकर और परोपकार को ही अपना मुख्य धर्म संकल्प करके अपने पूज्य पुरुषों अथवा ऋषि-मुनियों के मार्ग का अनुसरण करना चाहिए और दूसरे जीवों पर दया करके उनको मिध्यात्वरूपी अंधकार से निकाल कर जिनवाणी के प्रकाशरूप जैनधर्म की शरण में लाना चाहिए । यही हमारा इससमय मुख्य कर्तव्य है और इसी कर्तव्य को पूरा 16 अगस्त 2007 जिनभाषित Jain Education International करने से हम उपर्युक्त कलङ्क से विमुक्त हो सकते हैं। अथवा यों कहियें की अपने मस्तक पर जो कालिमा का टीका लगा हुआ है उसको दूर कर सकते हैं हमको चाहिये कि, अपने इस कर्त्तव्य का पालन करने में अब कुछ भी विलंब न करें। क्योंकि इस वक्त काल की गति जैनियों के अनुकूल है। अब वह समय नहीं रहा कि, जब अन्यायी और निष्ठुर राजा तथा बादशाहों के अन्याय और अत्याचारों के कारण जैनी अपने को जैनी कहते हुए डरते थे और अपने धर्म तथा शास्त्रों को छिपाने के लिए बाध्य होते थे। अब वह समय आ गया है कि, लोगों की प्रवृत्ति सत्यता की खोज और निष्पक्षपातता की ओर होती जा रही है। इसलिए जैनियों के लिए यह समय बड़ा ही अमूल्य है। ऐसे अवसर पर अवश्य अपने धर्मरत्न का प्रकाश सर्वसाधारण में फैलाना चाहिए। सर्वमनुष्यों पर जैनधर्म के सिद्धांत और उनका महत्त्व प्रगट करना चाहिए और उनको बतलाना चाहिए कि कैसे जैनधर्म ही सभी चीजों का कल्याण कर सकता है और उनको वास्तविक सुख की प्राप्ति करा सकता है। इससमय हमारे भाईयों को सिर्फ थोड़ी सी हिम्मत और परोपकार बुद्धि की जरूरत है। बाकी यह खूबी खुद जैनधर्म में मौजूद है कि, वह दूसरों को अपनी ओर आकर्षित कर लेवे परंतु दूसरों को इस धर्म से परिचय और जानकारी कराना मुख्य है और जैनियों का कर्तव्य है। , अतः प्यारे जैनियों! आप कुछ भी न घबराते हुए इस धर्मरत्न को हाथ में लेकर चौड़े मैदान में खड़े हो जाइये और जौहरियों से पुकार कर कहिये कि वे आकर इस रत्न की परीक्षा करें। फिर आप देखेगें की कितने धर्मजौहरी इस धर्मरत्न को देखकर मोहित होते हैं और किस पर अपना जीवन अर्पण करने के लिए उद्यमी नजर आते हैं। अभी हाल में कुछ लोगों के कानों तक इस धर्म का शुभ समाचार पहुँचा ही था कि, वे तुरंत मनवचन काय से इसके अनुयायी और भक्त बन गये हैं। इसलिए मेरा बार-बार यही कहना है कि, कोई भी मनुष्य इस पवित्र धर्म से वंचित न रक्खा जाये किसी न किसी प्रकार से प्रत्येक मनुष्य के कानों तक इस धर्म की आवाज (पुकार) पहुँच जानी चाहिए और इस बात का कभी दिल में ख्याल भी न लाना चाहिए कि अमुक मनुष्य इस धर्म को धारण करने के अयोग्य है अथवा इस धर्म का पात्र ही नहीं है क्योंकि यह धर्म प्राणी मात्र का धर्म है यदि 2 1 | For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.249053
Book TitleJaini kaun ho Sakta Hai
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages6
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size510 KB
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