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________________ 42 जिनवाणी 10 जनवरी 2011 अनुकूलता में मेघ को क्षणिक सुख भले ही मिल जाये, पर वे अन्त में उसके दुःख की परम्परा को बढ़ाने वाले ही होंगे। उन्होंने ऐसा कुछ भी न कर उसमें संयम का पुरुषार्थ जगाया। गुरु का बोध मिले, तब ही हमें पता चलेगा कि हम असमर्थताओं से नहीं अपितु संभावनों से भरे हैं । मेघकुमार का जीवन इसका एक सुन्दर उदाहरण है । एक और उदाहरण आपने सुना होगा अरणक मुनि का । अरणक अपने माता-पिता के साथ ही दीक्षित हुआ था । अरणक को साधु चर्या में कोई कष्ट न हो इसलिये उसके पिता मुनि स्नेहवश उसके सारे कार्य कर देते थे । फलस्वरूप अरणक मुनि को संयम पालन में परीषहों के सहन करने का कुछ भी अभ्यास नहीं हुआ। पिता के देहावसान पर जब अरणक को साध्वाचार के सारे कार्य स्वयं ही करने पड़े तो वह घबरा गया । उसमें निराशा व्याप्त होने लगी । निराशा में डूबा एक दिन वह भिक्षार्थ बाहर गया । रास्ते में भीषण गर्मी से घबराकर वह एक भव्य प्रासाद के तले उसकी छाया में खड़ा हो गया। उसी समय ऊपर खड़ी एक रमणी ने उसे देखा । सुन्दर और कोमल युवा मुनि को देखकर वह उस पर मोहित हो गई। उसने मुनि को ऊपर बुलाकर कहा - "क्यों मुनि कष्ट भोगकर जीवन को नष्ट कर रहे हो? तुम मेरे पास आ जाओ। हम यहाँ महलों में रहकर सुखों का उपभोग करते हुए अपने जीवन को सुखमय बना लेंगे।” अरणक का मन तो परीषहों के कारण पहले से ही विचलित हो रहा था। उस रमणी के सुखद बोलों ने उसे भोगों की ओर आकर्षित कर दिया । वह महलों में रहकर रमणी के साथ भोग-विलास में लिप्त हो गया । उधर जब अरणक दिखाई नहीं दिया तो उसकी साध्वी मां उसे ढूँढने निकल पड़ी। अरणक! अरणक! पुकारती हुई जब वह उस महल के पास से निकली तो अरणक ने मां की आवाज को पहचान लिया। नीचे देखा तो उसकी साध्वी मां खड़ी थी। वह तुरन्त नीचे आया और साध्वी मां को वंदन कर बोला- “माँ मैं तेरा बेटा अरणक आ गया हूँ।” साध्वी मां बोली- “नहीं, तूं मेरा बेटा नहीं हो सकता। मेरा बेटा तो अरणक मुनि था । मैं तो शेरनी हूँ और शेरनी का बेटा शेर ही हो सकता है। तूं तो गीदड़ है जो संयम से भ्रष्ट हो गया । तूं मेरा बेटा कैसे हो सकता है?” अरणक ने कहा- "मां, मैं मुनि-जीवन के परीषहों को कैसे सहन कर सकूँगा? मैं इनसे दुःखी होकर मर जाऊँगा।" साध्वी मां ने कहा- तुमको संयम में मरना श्रेयस्कर है, पर असंयम तो किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। असंयम में रहने से तो पृथ्वी पर पड़ी इस तप्त शिला पर संलेखना करना अच्छा है ।" साध्वी मां की बात सुनकर अरणक का शौर्य जाग गया। उसने उस तप्त शिला पर संलेखना ले ली और असंयम में मरने से बच गया। साध्वी मां का उद्बोधन अरणक के लिये गुरु के रूप में उद्बोधन था जिसके कारण उसके लिये एक झुलसती शिला भी आत्मबोध होने पर शीतल लगने लगी । बन्धुओं! कभी-कभी लोक प्रसिद्धि की कामना में अथवा अपनी विद्वत्ता के कारण साधकों में अहं भाव जाग जाता है। उस अहं में उनकी साधना गौण हो जाती है और वे अपना प्रभाव जमाने के लिये बाहरी प्रदर्शन और आडम्बर में लग जाते हैं। अपना प्रभाव बढ़ाने की लालसा में वे पर-भाव में आ जाते हैं और संयम जीवन से भ्रष्ट हो जाते हैं। ऐसे समय में भी एक मात्र गुरु ही उनके आन्तरिक अहं की आहट सुनकर उन्हें प्रतिबोधित करके उनके अहं का विगलन करते हैं और विनय धर्म की ओर मोड़ देते हैं। गुरु के उपालम्भ भरे Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.229947
Book TitleJivan me Guru ki Mahatta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGautammuni
PublisherZ_Jinvani_Guru_Garima_evam_Shraman_Jivan_Visheshank_003844.pdf
Publication Year2011
Total Pages6
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size1 MB
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