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________________ 254 जिनवाणी- जैनागम - साहित्य विशेषाङ्क कथा का सार अवसर्पिणी काल के चतुर्थ आरे में आमलकप्पा नामक नगरी थी जं कि पश्चिम विदेह में श्वेताम्बिका नगरी के समीप थी। उस नगरी के उत्तर पूर्व टिकू कोण में आम्रशालवन चैत्य था । उस नगरी में राजा सेय (श्वेत) राज्य करता था, जिसकी धारिणी नामक पटरानी थी। उस आमलकामा नगरी में अपनी शिष्य सम्पदा सहित श्रमण भगवान महावीर का पदार्पण हुआ, परिषद् बन्दना करने निकली, राजा सेय ने भ अनेक कौटुम्बिक पुरुषों के सहित सम्पूर्ण राजकीय वैभव के साथ भगवान के दर्शन एवं बन्दन के लिए आम्रशालवन चैत्य की ओर प्रस्थान किया, वह भगवान महावीर के समवशरण के न अति दूर एवं न अति समीप राजचि का परित्याग कर पाँच अभिगमपूर्वक भगवान महावीर के सम्मुख आकर तीन बार प्रदक्षिणा कर वंदन नमस्कार किया। जब भगवान महावीर आमलकप्पा नगरी में विराजमान थे उस समय प्रथम सौधर्म नामक देवलोक के सूर्याभ विमान की सुधर्मा सभा में सूर्याभ सिंहासन पर दिव्य वैभव के साथ बैठे हुए सूर्याभ नामक देव ने अपने विपुल अवधिज्ञान से जम्बूद्वीप का निरीक्षण करते हुए आमलकप्पा नगरी के आग्रशालवन चैत्य में भगवान महावीर को अपने शिष्य समुदाय सहित विराजित देखा तो वह अत्यंत हर्षित हुआ, सिंहासन से उठा, उत्तरासंग करके विनयपूर्वक सात आठ कदम चला, फिर बायां घुटना ऊँचा कर विनय आसन से बैठकर नमोत्थूण के पाठ से भगवान महावीर की स्तुति की। ब उस सूर्याभ देव के मन में भगवान महावीर के दर्शन करने का शुभ संकल्प उत्पन्न हुआ। उस सूर्याभ देव ने अपने आभियोगिक देवों को बुलाकर कहा कि तुम आमलकप्पा नगरी में जाकर भगवान महावीर के चारों ओर एक योजन त्रिज्या के क्षेत्र को देव रमण योग्य बनाकर मुझे सूचित करो । यह कार्य सम्पन्न होने के पश्चात् सूर्याभ देव ने अभियोगिक देवो को विमान निर्माण का आदेश दिया। दिव्य विमान की रचना के समाचार पाकर सूर्याभ देव ने दिव्य उत्तर वैक्रिय रूप की त्रिकुर्वणा की और अपने परिवार सहित चार अग्रमहिषियों एवं गंधर्व तथा नाट्य इन दो अनीकों को साथ लेकर उस दिव्य यान विमान पर पूर्व की ओर मुख करके आरूढ हुआ। तत्पश्चात् चार हजार सामानिक देव एवं अन्य देव-देवियां अपने लिये निश्चित स्थान पर विमान में बैठें। उस विमान पर आरूढ वह सूर्याभ देव सौधर्म कल्प के निर्याण मार्ग से निकलकर एक लाख योजन प्रमाण वाली दिव्य देवगति से नीचे उतरकर नन्दीश्वर द्वीप में रटिकर पर्वत पर आया । वहाँ आकर उस दिव्य देव ऋद्धि को धीरे-धीरे संकुचित कर जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र की आमलकप्पा नगरी के आग्रावन दैत्य में हाँ श्रमण भगवान महावीर स्वामी विराजमान श्री Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.229823
Book TitleRajprashniya Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSundarlal Jain
PublisherZ_Jinavani_003218.pdf
Publication Year2002
Total Pages8
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size129 KB
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